निरोगी जीवन
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच 2-3 इंच की दूरी रखें और शरीर को सीधा रखें। 2. दोनों हाथों को शरीर के पास रखें तथा सामान्य रूप से सांस लें। 3. गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाएं और उंगलियों को आपस में फंसा लें। 4. हथेलियों को ऊपर की ओर पलटें और धीरे-धीरे एड़ियों को उठाकर पंजों पर संतुलन बनाएं। 5. पूरे शरीर को ऊपर की ओर जितना आराम से हो सके खींचें, लेकिन किसी प्रकार का जोर न लगाएं। 6. सामने किसी एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित रखें और सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 40 सेकंड तक इस स्थिति में रहें और शरीर को स्थिर रखें। 8. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे एड़ियों को नीचे रखें और हाथों को सामान्य स्थिति में ले आएं। 9. कुछ सेकंड विश्राम करें और आवश्यकता अनुसार 3 से 5 बार दोहराएं।
ताड़ासन शरीर की मुद्रा (Posture) को सही बनाने में मदद करता है। रीढ़ की हड्डी को सीधा और मजबूत बनाता है। पैरों, घुटनों और टखनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का संतुलन और एकाग्रता बढ़ती है। कंधों और छाती में खिंचाव आने से शरीर लचीला बनता है। रक्त संचार बेहतर होता है जिससे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। लंबे समय तक खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है। नियमित अभ्यास से थकान कम होती है और शरीर अधिक सक्रिय महसूस करता है।
इस आसन का अभ्यास सुबह खाली पेट करना सबसे अच्छा माना जाता है। यदि सुबह संभव न हो तो भोजन के 3-4 घंटे बाद भी कर सकते हैं। शुरुआत में 20-30 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। प्रतिदिन 3 से 5 बार अभ्यास करना पर्याप्त है। यदि संतुलन बनाने में कठिनाई हो तो दीवार का सहारा ले सकते हैं। चक्कर आने या गंभीर पैर की चोट होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन बेहतर महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में शरीर की मुद्रा और लचीलापन सुधरने लगता है। नियमित 2 से 3 महीने अभ्यास करने पर रीढ़ मजबूत होती है, शरीर अधिक संतुलित और सक्रिय महसूस होता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को मिलाएं और शरीर का भार दोनों पैरों पर समान रखें। 2. गहरी सांस लें और दाएं पैर को मोड़कर उसके तलवे को बाईं जांघ के अंदर रखें। 3. संतुलन बनाते हुए दोनों हाथों को नमस्कार मुद्रा में छाती के सामने जोड़ें। 4. यदि संतुलन बन जाए तो हाथों को धीरे-धीरे सिर के ऊपर ले जाएं। 5. सामने किसी एक स्थिर बिंदु को देखते रहें और सामान्य गति से सांस लेते रहें। 6. रीढ़ को सीधा रखें तथा शरीर को बिना हिलाए संतुलित रखने का प्रयास करें। 7. 20 से 40 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस छोड़ते हुए हाथ नीचे लाएं और पैर को वापस जमीन पर रखें। 9. अब यही प्रक्रिया दूसरे पैर से दोहराएं। 10. दोनों पैरों से 2 से 3 बार अभ्यास करें।
वृक्षासन शरीर का संतुलन और स्थिरता बढ़ाने वाला प्रमुख योगासन है। यह पैरों, घुटनों और टखनों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। रीढ़ सीधी रहती है और शरीर का पोश्चर सुधरता है। मानसिक एकाग्रता और आत्मविश्वास बढ़ता है। तनाव और बेचैनी कम करने में सहायता करता है। कूल्हों और जांघों में लचीलापन बढ़ाता है। तंत्रिका तंत्र को सक्रिय रखता है तथा शरीर और मन के बीच बेहतर तालमेल विकसित करता है। नियमित अभ्यास से धैर्य और ध्यान लगाने की क्षमता भी बढ़ती है।
इस आसन का अभ्यास सुबह खाली पेट करना सबसे अच्छा होता है। यदि सुबह समय न मिले तो शाम को भोजन के 3 से 4 घंटे बाद भी कर सकते हैं। शुरुआत में प्रत्येक पैर से 20 से 30 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय 1 मिनट तक बढ़ाएं। प्रतिदिन 2 से 3 राउंड पर्याप्त हैं। संतुलन बनाने में कठिनाई हो तो दीवार का सहारा लें। चक्कर आने या गंभीर घुटने की चोट होने पर सावधानी बरतें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन और एकाग्रता में सुधार महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में पैरों की मजबूती और शरीर की स्थिरता बढ़ती है। नियमित 2 से 3 महीने अभ्यास करने पर शरीर का पोश्चर बेहतर होता है तथा मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास में स्पष्ट वृद्धि दिखाई देती है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच लगभग 3 से 4 फीट की दूरी रखें। 2. दोनों हाथों को कंधों की सीध में दोनों तरफ फैलाएं और हथेलियां नीचे रखें। 3. दाएं पैर को बाहर की ओर लगभग 90 डिग्री घुमाएं तथा बाएं पैर को थोड़ा अंदर रखें। 4. गहरी सांस लेते हुए शरीर को दाईं ओर झुकाना शुरू करें। 5. दाएं हाथ को टखने, पिंडली या जमीन पर रखें और बाएं हाथ को सीधा ऊपर रखें। 6. सिर को ऊपर उठाकर बाएं हाथ की उंगलियों की ओर देखें और सामान्य रूप से सांस लेते रहें। 7. रीढ़ और दोनों पैरों को सीधा रखें तथा शरीर को मोड़ने के बजाय केवल बगल की ओर झुकाएं। 8. 20 से 30 सेकंड तक इस स्थिति में रहें और शरीर को संतुलित रखें। 9. सांस लेते हुए धीरे-धीरे वापस सीधी स्थिति में आएं। 10. यही प्रक्रिया दूसरी ओर दोहराएं और दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें।
त्रिकोणासन शरीर के दोनों तरफ की मांसपेशियों को मजबूत और लचीला बनाता है। रीढ़ की हड्डी को स्वस्थ और लचीला रखने में मदद करता है। कमर और पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक माना जाता है। पाचन क्रिया बेहतर होती है और कब्ज की समस्या में राहत मिल सकती है। पैरों, घुटनों और टखनों की मजबूती बढ़ती है। कंधों और छाती में अच्छा खिंचाव आता है। शरीर का संतुलन और लचीलापन बढ़ता है। तनाव कम करने और मन को शांत रखने में सहायता करता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक सक्रिय और चुस्त महसूस होता है।
इस आसन का अभ्यास सुबह खाली पेट करना सबसे उत्तम होता है। यदि सुबह संभव न हो तो भोजन के 3 से 4 घंटे बाद भी कर सकते हैं। शुरुआत में 20 से 30 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। दोनों तरफ से 2 से 3 राउंड करना पर्याप्त है। कमर या गर्दन में गंभीर दर्द होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही अभ्यास करें। शरीर को अपनी क्षमता से अधिक न झुकाएं और झटके से बचें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में कमर, पैरों और रीढ़ की मजबूती में सुधार दिखाई देता है। नियमित अभ्यास से शरीर का संतुलन बेहतर होता है और दैनिक कार्यों में फुर्ती एवं ऊर्जा बनी रहती है।
1. समतल स्थान पर योगा मैट बिछाकर पेट के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों पैरों को सीधा रखें और एड़ियों को आपस में मिलाने का प्रयास करें। 3. दोनों हथेलियों को कंधों के पास जमीन पर रखें तथा कोहनियों को शरीर से सटाकर रखें। 4. गहरी सांस लेते हुए धीरे-धीरे सिर, गर्दन और छाती को ऊपर उठाएं। 5. नाभि तक का भाग जमीन पर रखें और कंधों को पीछे की ओर खींचें। 6. गर्दन पर अधिक दबाव न डालें तथा सामने या हल्का ऊपर देखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे पहले छाती, फिर कंधे और अंत में माथे को जमीन पर ले आएं। 9. कुछ सेकंड आराम करें और शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। 10. अपनी क्षमता के अनुसार इस आसन को 3 से 5 बार दोहराएं।
भुजंगासन रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाता है। पीठ और कमर की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। लंबे समय तक बैठकर काम करने वालों के लिए यह लाभदायक है। छाती खुलती है जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है। पाचन तंत्र को सक्रिय करने में सहायता करता है। पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आता है और अतिरिक्त चर्बी कम करने में मदद मिलती है। तनाव और थकान कम होती है। शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक ऊर्जावान और सक्रिय महसूस करता है।
भुजंगासन का अभ्यास सुबह खाली पेट करना सबसे अच्छा माना जाता है। यदि सुबह संभव न हो तो भोजन के 3 से 4 घंटे बाद भी कर सकते हैं। शुरुआत में 20 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। प्रतिदिन 3 से 5 राउंड पर्याप्त हैं। गर्भावस्था, गंभीर कमर दर्द, हर्निया या हाल की पेट की सर्जरी होने पर यह आसन विशेषज्ञ की सलाह से ही करें। आसन करते समय कमर पर अधिक जोर न डालें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर पीठ में हल्कापन और शरीर में लचीलापन महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में रीढ़ और पीठ की मजबूती में सुधार दिखाई देता है। नियमित अभ्यास से कमर स्वस्थ रहती है, शरीर अधिक सक्रिय बनता है और बैठने की मुद्रा में भी सुधार आता है।
1. समतल स्थान पर योगा मैट बिछाकर दोनों पैरों को सामने सीधा फैलाकर बैठ जाएं। 2. रीढ़ को सीधा रखें और दोनों हाथों को जांघों के पास रखें। 3. गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएं। 4. सांस छोड़ते हुए कमर से धीरे-धीरे आगे की ओर झुकना शुरू करें। 5. दोनों हाथों से पैरों के अंगूठे, तलवे या टखनों को पकड़ने का प्रयास करें। 6. बिना जोर लगाए सिर को घुटनों के जितना पास ला सकें, उतना लाएं। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस लेते हुए धीरे-धीरे शरीर को वापस सीधा उठाएं और हाथों को नीचे ले आएं। 9. कुछ सेकंड आराम करें और शरीर को ढीला छोड़ दें। 10. अपनी क्षमता के अनुसार इस आसन को 3 से 5 बार दोहराएं।
पश्चिमोत्तानासन रीढ़ की हड्डी को लचीला और मजबूत बनाता है। पेट और कमर की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक माना जाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है और कब्ज की समस्या में राहत दिला सकता है। जांघों, पिंडलियों और हैमस्ट्रिंग की मांसपेशियों में अच्छा खिंचाव आता है। मानसिक तनाव और चिंता कम करने में मदद करता है। शरीर को शांत और आरामदायक महसूस कराता है। रक्त संचार बेहतर होता है और शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। नियमित अभ्यास से शरीर का लचीलापन और सहनशक्ति दोनों बढ़ती हैं।
इस आसन का अभ्यास सुबह खाली पेट करना सबसे अच्छा होता है। यदि सुबह संभव न हो तो भोजन के 3 से 4 घंटे बाद करें। शुरुआत में 20 से 30 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। प्रतिदिन 3 से 5 राउंड पर्याप्त हैं। कमर, रीढ़ या स्लिप डिस्क की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही अभ्यास करें। शरीर को जबरदस्ती आगे न झुकाएं और धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाएं।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में कमर, पैरों और रीढ़ की मांसपेशियां मजबूत होने लगती हैं। नियमित अभ्यास से पाचन बेहतर होता है, शरीर अधिक फुर्तीला महसूस करता है और तनाव में भी कमी आती है।
1. समतल स्थान पर योगा मैट बिछाकर घुटनों के बल बैठ जाएं। 2. दोनों पैरों के अंगूठों को आपस में मिलाएं और एड़ियों को थोड़ा अलग रखें। 3. धीरे-धीरे अपने नितंबों को दोनों एड़ियों के बीच आराम से टिकाएं। 4. दोनों हाथों को घुटनों पर रखें और हथेलियों को नीचे की ओर रखें। 5. रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखें तथा कंधों को ढीला छोड़ दें। 6. आंखें बंद करके सामान्य गति से गहरी और शांत सांस लेते रहें। 7. शरीर को पूरी तरह आराम की स्थिति में रखते हुए 2 से 5 मिनट तक इसी मुद्रा में बैठें। 8. समय पूरा होने पर धीरे-धीरे आगे झुकें और हाथों की सहायता से खड़े हो जाएं। 9. शुरुआत में कम समय तक बैठें और धीरे-धीरे अवधि बढ़ाएं। 10. आवश्यकता अनुसार इस आसन का अभ्यास दिन में 2 से 3 बार करें।
वज्रासन पाचन तंत्र को मजबूत बनाने वाला सबसे प्रभावी योगासनों में से एक माना जाता है। भोजन के बाद करने से पाचन में सहायता मिलती है। गैस, अपच और कब्ज जैसी समस्याओं में लाभ मिल सकता है। रीढ़ को सीधा रखने में मदद करता है और बैठने की सही आदत विकसित करता है। मन को शांत करता है तथा तनाव कम करने में सहायक है। पैरों, घुटनों और टखनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। ध्यान और प्राणायाम के लिए यह एक श्रेष्ठ बैठने की मुद्रा है। नियमित अभ्यास से शरीर में स्थिरता और मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
वज्रासन ऐसा योगासन है जिसे भोजन के बाद भी किया जा सकता है। सुबह, दोपहर या रात के भोजन के बाद 5 से 10 मिनट तक इसका अभ्यास करना लाभदायक माना जाता है। शुरुआत में 2 से 3 मिनट तक बैठें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। यदि घुटनों में हल्का दर्द हो तो मुलायम मैट या कंबल का उपयोग करें। घुटने की गंभीर चोट या हाल की सर्जरी होने पर डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही अभ्यास करें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर पाचन में सुधार और शरीर में हल्कापन महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में बैठने की मुद्रा, एकाग्रता और पाचन क्षमता बेहतर होने लगती है। नियमित अभ्यास से लंबे समय तक पाचन तंत्र मजबूत रहता है और मानसिक शांति का अनुभव होता है।
1. समतल स्थान पर योगा मैट बिछाकर दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं पैर को मोड़कर उसका तलवा बाईं जांघ पर रखें। 3. अब बाएं पैर को मोड़कर उसका तलवा दाईं जांघ पर रखें। 4. दोनों घुटनों को आराम से जमीन की ओर टिकाने का प्रयास करें। 5. रीढ़, गर्दन और सिर को बिल्कुल सीधा रखें तथा कंधों को ढीला छोड़ दें। 6. दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा या चिन मुद्रा में रखें। 7. आंखें बंद करके धीरे-धीरे गहरी और सामान्य सांस लेते रहें। 8. मन को अपनी श्वास या किसी एक बिंदु पर केंद्रित रखें। 9. 2 से 10 मिनट तक इस मुद्रा में आराम से बैठे रहें। 10. धीरे-धीरे पैरों को खोलें, थोड़ी देर विश्राम करें और आवश्यकता हो तो दूसरी तरफ से भी अभ्यास करें।
पद्मासन ध्यान और प्राणायाम के लिए सबसे उत्तम बैठने की मुद्राओं में से एक है। यह मन को शांत और स्थिर बनाने में मदद करता है। मानसिक तनाव, चिंता और बेचैनी कम करने में सहायक होता है। रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है जिससे बैठने की सही आदत विकसित होती है। कूल्हों, घुटनों और टखनों में लचीलापन बढ़ता है। शरीर का संतुलन और एकाग्रता बेहतर होती है। नियमित अभ्यास से ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ती है। लंबे समय तक बैठकर पूजा, ध्यान या योग करने में सुविधा मिलती है।
इस आसन का अभ्यास सुबह के समय शांत वातावरण में करना सबसे अच्छा माना जाता है। ध्यान, प्राणायाम या मेडिटेशन से पहले इसका अभ्यास करें। शुरुआत में 2 से 3 मिनट तक बैठें और धीरे-धीरे समय 10 से 20 मिनट तक बढ़ा सकते हैं। यदि दोनों पैर पूरी तरह मोड़ना कठिन लगे तो पहले अर्ध पद्मासन का अभ्यास करें। घुटनों या कूल्हों में गंभीर दर्द होने पर इसे जबरदस्ती न करें और विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर मन शांत और एकाग्र महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में बैठने की क्षमता और लचीलापन बढ़ने लगता है। नियमित अभ्यास से ध्यान लगाने में आसानी होती है तथा मानसिक शांति और स्थिरता का अनुभव लंबे समय तक बना रहता है।
1. योगा मैट पर घुटनों के बल बैठकर वज्रासन की स्थिति में आएं। 2. गहरी सांस लें और सांस छोड़ते हुए शरीर को धीरे-धीरे आगे की ओर झुकाएं। 3. माथे को जमीन पर टिकाएं और दोनों हाथों को सामने की ओर सीधा फैलाएं। 4. चाहें तो हाथों को शरीर के दोनों ओर भी रख सकते हैं। 5. पेट को जांघों पर आराम से टिकने दें और कंधों को ढीला छोड़ दें। 6. आंखें बंद रखें और सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 30 सेकंड से 1 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस लेते हुए धीरे-धीरे शरीर को ऊपर उठाएं।
बालासन शरीर और मन दोनों को गहरा आराम देता है। कमर, कंधों और गर्दन के तनाव को कम करता है। रीढ़ को आराम मिलता है। मानसिक तनाव और चिंता घटती है। थकान दूर होती है। पाचन तंत्र को आराम मिलता है। शरीर में लचीलापन बढ़ता है। योग अभ्यास के बीच विश्राम के लिए यह सबसे अच्छा आसन माना जाता है।
सुबह या शाम खाली पेट करें। किसी भी कठिन योगासन के बाद विश्राम के लिए किया जा सकता है। 30 सेकंड से 2 मिनट तक रुकें। गंभीर घुटने की चोट होने पर सावधानी रखें।
कुछ दिनों के अभ्यास से शरीर हल्का और तनाव कम महसूस होता है। 3 से 4 सप्ताह में कमर और पीठ की जकड़न कम होने लगती है।
1. पेट के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों पैरों को थोड़ा फैलाकर रखें। 3. दोनों हाथों को मोड़कर एक के ऊपर एक रखें। 4. ठुड्डी या माथे को हाथों पर टिकाएं। 5. पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। 6. आंखें बंद रखें और गहरी सांस लें। 7. 2 से 5 मिनट तक आराम की स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में वापस आएं।
मकरासन पीठ और कमर को गहरा आराम देता है। रीढ़ की मांसपेशियों का तनाव कम करता है। सांस लेने की क्षमता बेहतर होती है। मानसिक तनाव घटता है। उच्च रक्तचाप वाले लोगों के लिए आरामदायक आसन माना जाता है। थकान दूर करता है। शरीर को शांत करता है। अन्य पेट के बल किए जाने वाले योगासनों के बीच विश्राम के लिए उपयोगी है।
सुबह या शाम खाली पेट करें। भुजंगासन, शलभासन या धनुरासन के बाद करना लाभदायक रहता है। 2 से 5 मिनट तक आराम से रहें।
नियमित अभ्यास से कुछ ही दिनों में पीठ को आराम महसूस होता है। लगभग 3 सप्ताह में शरीर अधिक आरामदायक और तनावमुक्त महसूस करने लगता है।
1. पेट के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों हाथों को जांघों के नीचे रखें और ठुड्डी को जमीन पर टिकाएं। 3. गहरी सांस लें। 4. धीरे-धीरे दोनों पैरों को बिना मोड़े ऊपर उठाएं। 5. जितना संभव हो उतना ऊपर उठाकर सामान्य सांस लेते रहें। 6. 15 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 7. सांस छोड़ते हुए पैरों को धीरे-धीरे नीचे लाएं। 8. 3 से 5 बार दोहराएं।
शलभासन कमर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। रीढ़ की हड्डी लचीली होती है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में मदद करता है। पाचन तंत्र सक्रिय होता है। जांघों और कूल्हों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। थकान कम होती है। नियमित अभ्यास से कमर दर्द में भी लाभ मिल सकता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में कम समय तक रुकें। 3 से 5 राउंड पर्याप्त हैं। गंभीर कमर दर्द या गर्भावस्था में यह आसन न करें।
2 सप्ताह में कमर की मजबूती महसूस होने लगती है। लगभग 1 महीने में शरीर अधिक लचीला और मजबूत बनता है।
1. पेट के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों घुटनों को मोड़कर पैरों को ऊपर उठाएं। 3. दोनों हाथों से टखनों को पकड़ लें। 4. गहरी सांस लेते हुए छाती और जांघों को ऊपर उठाएं। 5. शरीर धनुष के समान दिखाई देगा। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं।
धनुरासन पूरे शरीर का अच्छा व्यायाम करता है। रीढ़ मजबूत और लचीली बनती है। पेट की चर्बी कम करने में मदद करता है। पाचन क्रिया बेहतर होती है। छाती और कंधे खुलते हैं। हाथ और पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। तनाव कम होता है और शरीर फुर्तीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। हर्निया, गर्भावस्था या गंभीर कमर दर्द में इस आसन से बचें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन बढ़ता है। लगभग 1 महीने में कमर और पेट की मांसपेशियां मजबूत महसूस होती हैं।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों पैरों को मोड़कर घुटनों को छाती की ओर लाएं। 3. दोनों हाथों से घुटनों को पकड़ लें। 4. सांस छोड़ते हुए घुटनों को पेट से हल्के दबाएं। 5. यदि संभव हो तो सिर उठाकर ठुड्डी को घुटनों के पास लाएं। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को सीधा करके सामान्य स्थिति में लौट आएं।
पवनमुक्तासन गैस और अपच की समस्या में लाभदायक माना जाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। कमर को हल्का खिंचाव मिलता है। कब्ज की समस्या में राहत मिल सकती है। रक्त संचार बेहतर होता है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक है। शरीर को आराम और हल्कापन महसूस होता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 से 5 बार अभ्यास करें। पेट की सर्जरी, हर्निया या गर्भावस्था में यह आसन न करें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर पाचन में सुधार महसूस होने लगता है। लगभग 3 से 4 सप्ताह में गैस और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है।
1. योगा मैट पर घुटनों के बल सीधे खड़े हो जाएं। 2. दोनों घुटनों के बीच कंधों जितनी दूरी रखें और रीढ़ को सीधा रखें। 3. दोनों हाथों को कमर पर रखें तथा गहरी सांस लें। 4. धीरे-धीरे शरीर को पीछे की ओर झुकाना शुरू करें। 5. एक-एक करके दोनों हाथों से एड़ियों को पकड़ें। 6. छाती को ऊपर उठाएं, गर्दन को आराम से पीछे ले जाएं और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस लेते हुए एक-एक हाथ वापस कमर पर लाएं और धीरे-धीरे सीधा हो जाएं।
उष्ट्रासन छाती और फेफड़ों को फैलाकर सांस लेने की क्षमता बढ़ाता है। रीढ़ की हड्डी को लचीला और मजबूत बनाता है। कंधों, गर्दन और पीठ के तनाव को कम करता है। पेट की मांसपेशियों में अच्छा खिंचाव आता है। शरीर की मुद्रा में सुधार होता है। मानसिक तनाव कम करने में मदद करता है। शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति बढ़ती है। लंबे समय तक बैठकर काम करने वालों के लिए यह लाभदायक आसन है।
इस आसन का अभ्यास सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में 15 से 20 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। 2 से 3 राउंड पर्याप्त हैं। कमर, गर्दन या घुटनों में गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें। शरीर को क्षमता से अधिक पीछे न झुकाएं।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन महसूस होने लगता है। लगभग 1 महीने में रीढ़ मजबूत होती है और शरीर की मुद्रा में सुधार दिखाई देता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों घुटनों को मोड़कर पैरों को कूल्हों के पास रखें। 3. दोनों हाथ शरीर के पास रखें और हथेलियां जमीन पर टिकाएं। 4. गहरी सांस लेते हुए धीरे-धीरे कमर और पीठ को ऊपर उठाएं। 5. कंधों और पैरों पर शरीर का संतुलन बनाए रखें। 6. चाहें तो दोनों हाथों की उंगलियों को पीठ के नीचे आपस में जोड़ सकते हैं। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे कमर को वापस जमीन पर ले आएं।
सेतु बंधासन रीढ़ की हड्डी और कमर को मजबूत बनाता है। छाती और कंधों में अच्छा खिंचाव आता है। थायरॉइड ग्रंथि को सक्रिय करने में सहायक माना जाता है। पाचन तंत्र बेहतर होता है। तनाव और थकान कम होती है। पैरों और कूल्हों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का लचीलापन बढ़ता है। नियमित अभ्यास से पीठ का दर्द कम करने में भी मदद मिल सकती है।
सुबह खाली पेट करें या भोजन के 4 घंटे बाद करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें और 3 से 5 बार दोहराएं। गर्दन या रीढ़ की गंभीर समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और पीठ मजबूत महसूस होने लगती है। लगभग 1 महीने में शरीर का लचीलापन बढ़ जाता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों पैरों को मिलाकर रखें और हाथों को शरीर के पास रखें। 3. गहरी सांस लें और सांस छोड़ते हुए सिर, हाथ और पैरों को एक साथ ऊपर उठाएं। 4. शरीर का आकार नाव जैसा बनाएं। 5. हाथों को पैरों की दिशा में सीधा रखें। 6. पेट की मांसपेशियों पर संतुलन बनाए रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 15 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे शरीर को वापस जमीन पर लाकर आराम करें।
नौकासन पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक है। पाचन क्रिया बेहतर होती है। कमर और रीढ़ मजबूत होती है। हाथों और पैरों की मांसपेशियों में ताकत बढ़ती है। शरीर का संतुलन और सहनशक्ति बढ़ती है। शरीर अधिक सक्रिय और ऊर्जावान महसूस करता है। नियमित अभ्यास से कोर मसल्स मजबूत होती हैं।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में 15 से 20 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। 3 राउंड पर्याप्त हैं। हर्निया, गर्भावस्था या गंभीर कमर दर्द होने पर यह आसन न करें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर पेट और कमर मजबूत महसूस होने लगते हैं। लगभग 1 महीने में शरीर की सहनशक्ति और संतुलन बेहतर हो जाता है।
1. दोनों हाथों और घुटनों के बल टेबल मुद्रा में आ जाएं। 2. हथेलियों को कंधों के नीचे और घुटनों को कूल्हों के नीचे रखें। 3. सांस छोड़ते हुए घुटनों को जमीन से ऊपर उठाएं। 4. कूल्हों को ऊपर उठाकर शरीर का उल्टा V आकार बनाएं। 5. सिर को दोनों हाथों के बीच रखें और एड़ियों को जमीन की ओर ले जाने का प्रयास करें। 6. रीढ़ और पैरों को सीधा रखने की कोशिश करें। 7. सामान्य सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे घुटनों को जमीन पर लाकर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
अधोमुख श्वानासन पूरे शरीर में खिंचाव लाता है। रीढ़ की हड्डी मजबूत और लचीली बनती है। कंधों, हाथों और पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। रक्त संचार बेहतर होता है। मानसिक तनाव कम करने में मदद मिलती है। शरीर का संतुलन और लचीलापन बढ़ता है। लंबे समय तक बैठने से होने वाली जकड़न कम होती है। शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें और 3 से 5 बार दोहराएं। कलाई, कंधे या हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन बढ़ने लगता है। लगभग 1 महीने में पूरे शरीर की मजबूती और संतुलन में सुधार दिखाई देता है।
1. योगा मैट पर दोनों हाथों और घुटनों के बल आ जाएं। 2. हथेलियों को कंधों के नीचे और घुटनों को कूल्हों के नीचे रखें। 3. गहरी सांस लेते हुए पीठ को नीचे झुकाएं और सिर को ऊपर उठाएं। 4. सांस छोड़ते हुए पीठ को ऊपर गोल करें और ठुड्डी को छाती से लगाएं। 5. दोनों गतियों को धीरे-धीरे और बिना झटके के करें। 6. श्वास और शरीर की गति का तालमेल बनाए रखें। 7. 8 से 10 बार इस प्रक्रिया को दोहराएं। 8. अंत में सामान्य स्थिति में आकर कुछ क्षण विश्राम करें।
मार्जरीआसन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है। कमर और गर्दन का तनाव कम करता है। शरीर की जकड़न दूर होती है। पाचन क्रिया बेहतर होती है। पेट और पीठ की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। रक्त संचार बढ़ता है। तनाव कम होकर मन शांत रहता है। लंबे समय तक बैठकर काम करने वालों के लिए यह बहुत लाभदायक योगासन है।
सुबह खाली पेट करें। 8 से 10 राउंड पर्याप्त हैं। इसे वार्म-अप योगासन के रूप में भी किया जा सकता है। गंभीर कलाई या घुटने की चोट होने पर सावधानी रखें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और गर्दन की जकड़न कम होने लगती है। लगभग 1 महीने में रीढ़ अधिक लचीली और मजबूत महसूस होती है।
1. योगा मैट पर दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं पैर को मोड़कर उसका तलवा बाईं जांघ के अंदर रखें। 3. बाएं पैर को सीधा रखें और रीढ़ को सीधा रखें। 4. गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाएं। 5. सांस छोड़ते हुए आगे झुकें और बाएं पैर के पंजे या टखने को पकड़ने का प्रयास करें। 6. सिर को घुटने के पास लाने का प्रयास करें, लेकिन शरीर पर अधिक जोर न दें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस उठें और दूसरी तरफ यही प्रक्रिया दोहराएं।
जानु शीर्षासन रीढ़ की हड्डी और पैरों को लचीला बनाता है। हैमस्ट्रिंग और जांघों की मांसपेशियों में अच्छा खिंचाव आता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक माना जाता है। तनाव और मानसिक थकान कम होती है। कमर मजबूत होती है। शरीर का लचीलापन बढ़ता है। नियमित अभ्यास से एकाग्रता और मानसिक शांति भी बढ़ती है।
इस आसन का अभ्यास सुबह खाली पेट करें। दोनों पैरों से 2 से 3 बार अभ्यास करें। शुरुआत में कम समय तक रुकें और धीरे-धीरे अवधि बढ़ाएं। कमर या घुटनों की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन बढ़ने लगता है। लगभग 1 महीने में कमर और पैरों की मजबूती तथा पाचन में सुधार महसूस होता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं और दोनों हाथों को शरीर के पास रखें। 2. गहरी सांस लेते हुए दोनों पैरों को धीरे-धीरे 90 डिग्री तक उठाएं। 3. हाथों का सहारा लेते हुए पैरों को सिर के पीछे ले जाएं। 4. पैरों की उंगलियों को जितना संभव हो जमीन से लगाने का प्रयास करें। 5. गर्दन को बिल्कुल स्थिर रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 6. 15 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 7. धीरे-धीरे रीढ़ को सहारा देते हुए वापस सामान्य स्थिति में आएं। 8. कुछ क्षण शवासन में विश्राम करें।
हलासन रीढ़ की हड्डी को लचीला और मजबूत बनाता है। थायरॉइड ग्रंथि को सक्रिय करने में सहायक माना जाता है। पाचन तंत्र बेहतर होता है। कब्ज की समस्या में लाभ मिल सकता है। पीठ और कंधों की जकड़न कम होती है। रक्त संचार बेहतर होता है। तनाव कम होता है। शरीर में लचीलापन और संतुलन बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में 15 से 20 सेकंड तक रुकें। 2 से 3 राउंड पर्याप्त हैं। गर्दन, रीढ़, हाई ब्लड प्रेशर या हृदय रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह के बिना अभ्यास न करें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर अधिक लचीला महसूस होने लगता है। लगभग 1 महीने में रीढ़ और पाचन तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव दिखाई देता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं और हाथों को शरीर के पास रखें। 2. गहरी सांस लेते हुए दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं। 3. कमर को हाथों का सहारा देकर पूरे शरीर को कंधों पर संतुलित करें। 4. पैरों को सीधा ऊपर रखें और ठुड्डी को छाती के पास रखें। 5. सामान्य गति से सांस लेते रहें और शरीर को स्थिर रखें। 6. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 7. धीरे-धीरे कमर को नीचे लाकर पैरों को जमीन पर रखें। 8. कुछ समय शवासन में विश्राम करें।
सर्वांगासन को पूरे शरीर के लिए लाभकारी योगासन माना जाता है। यह रक्त संचार को बेहतर बनाता है। थायरॉइड ग्रंथि को सक्रिय करने में सहायक है। रीढ़ और कंधों की मजबूती बढ़ती है। मानसिक तनाव कम होता है। नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। शरीर का संतुलन बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक ऊर्जावान महसूस करता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में 15 से 20 सेकंड तक रुकें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। गर्दन की समस्या, उच्च रक्तचाप या हृदय रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में स्फूर्ति महसूस होने लगती है। लगभग 1 महीने में संतुलन और लचीलापन बेहतर हो जाता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों पैरों को थोड़ा अलग रखें और हाथों को शरीर से थोड़ी दूरी पर रखें। 3. हथेलियों को ऊपर की ओर रखें और आंखें बंद कर लें। 4. पूरे शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। 5. सांस को सामान्य रखें और किसी प्रकार का तनाव न लें। 6. अपना ध्यान केवल श्वास पर केंद्रित रखें। 7. 5 से 10 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे हाथ-पैर हिलाकर सामान्य स्थिति में वापस आएं।
शवासन शरीर और मन को गहरा आराम देता है। तनाव, चिंता और थकान कम होती है। रक्तचाप को सामान्य रखने में सहायता मिलती है। योग अभ्यास के बाद शरीर को पुनः ऊर्जा मिलती है। मानसिक शांति बढ़ती है। एकाग्रता बेहतर होती है। अच्छी नींद में सहायता मिलती है। पूरे शरीर की मांसपेशियों को आराम मिलता है।
हर योग सत्र के अंत में 5 से 10 मिनट तक अवश्य करें। सुबह या शाम किसी भी समय किया जा सकता है। शांत वातावरण में अभ्यास करें और बीच में शरीर को अनावश्यक न हिलाएं।
पहले ही दिन से शरीर और मन में आराम महसूस होता है। नियमित अभ्यास से तनाव कम होता है और मानसिक शांति तथा नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं और दोनों पैरों को मिलाकर रखें। 2. दोनों हाथों को कूल्हों के नीचे रखें। 3. कोहनियों का सहारा लेते हुए छाती को ऊपर उठाएं। 4. सिर को पीछे झुकाकर सिर का ऊपरी भाग हल्के से जमीन पर टिकाएं। 5. छाती को ऊपर की ओर उठाए रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 6. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 7. धीरे-धीरे सिर और पीठ को वापस जमीन पर लाएं। 8. कुछ सेकंड विश्राम करें और आवश्यकता हो तो दोहराएं।
मत्स्यासन छाती और फेफड़ों को फैलाता है जिससे सांस लेने में आसानी होती है। रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है। गर्दन और कंधों का तनाव कम होता है। थायरॉइड ग्रंथि को सक्रिय करने में सहायक माना जाता है। शरीर की मुद्रा में सुधार होता है। मानसिक तनाव कम होता है। रक्त संचार बेहतर होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक ऊर्जावान महसूस करता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें और 2 से 3 बार अभ्यास करें। गर्दन या रीढ़ की गंभीर समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर छाती और रीढ़ में लचीलापन बढ़ने लगता है। लगभग 1 महीने में शरीर अधिक खुला, संतुलित और ऊर्जावान महसूस होता है।
1. सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में आराम से बैठ जाएं। 2. रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखें। 3. बाएं हाथ को ज्ञान मुद्रा में रखें और दाएं हाथ से नासिका मुद्रा बनाएं। 4. दाएं अंगूठे से दायां नथुना बंद करके बाएं नथुने से गहरी सांस लें। 5. अब अनामिका से बायां नथुना बंद करें और दाएं नथुने से धीरे-धीरे सांस छोड़ें। 6. फिर दाएं नथुने से सांस लें और बाएं नथुने से छोड़ें। 7. यही एक चक्र कहलाता है, इसे धीरे-धीरे दोहराते रहें। 8. पूरे अभ्यास के दौरान सांस लंबी, गहरी और शांत रखें।
अनुलोम विलोम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। शरीर में ऑक्सीजन का संचार बेहतर होता है। मानसिक तनाव और चिंता कम होती है। एकाग्रता और याददाश्त में सुधार होता है। रक्त संचार बेहतर होता है। प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। मन शांत रहता है। नियमित अभ्यास से शरीर और मन दोनों संतुलित रहते हैं।
सुबह खाली पेट शांत वातावरण में करें। शुरुआत में 5 मिनट तक करें और धीरे-धीरे समय 15 मिनट तक बढ़ाएं। जल्दबाजी न करें और सांस को जबरदस्ती न रोकें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर मानसिक शांति महसूस होने लगती है। लगभग 1 महीने में श्वसन क्षमता और एकाग्रता में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है.
1. सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाएं। 2. रीढ़ को सीधा रखें और शरीर को आराम दें। 3. गहरी सांस लें। 4. पेट को अंदर की ओर खींचते हुए तेजी से सांस बाहर छोड़ें। 5. सांस अंदर अपने आप चली जाएगी, केवल सांस छोड़ने पर ध्यान दें। 6. लगातार समान गति से यह प्रक्रिया दोहराएं। 7. शुरुआत में 30 बार करें और धीरे-धीरे संख्या बढ़ाएं। 8. प्रत्येक राउंड के बाद कुछ सेकंड सामान्य श्वास लें।
कपालभाति फेफड़ों को मजबूत बनाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक माना जाता है। शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में मदद करता है। मानसिक स्पष्टता बढ़ती है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। नियमित अभ्यास से चेहरा अधिक चमकदार दिखाई दे सकता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में 30 से 50 बार करें और धीरे-धीरे 100 तक बढ़ा सकते हैं। उच्च रक्तचाप, हृदय रोग या गर्भावस्था में विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर हल्का और ऊर्जावान महसूस होता है। लगभग 1 महीने में पाचन और श्वसन क्षमता में सुधार दिखाई देता है।
1. सुखासन या पद्मासन में आराम से बैठ जाएं। 2. आंखें बंद करें और शरीर को पूरी तरह शांत रखें। 3. दोनों अंगूठों से कानों को हल्के से बंद करें। 4. बाकी उंगलियों को आंखों और माथे पर हल्के से रखें। 5. गहरी सांस लें। 6. सांस छोड़ते समय मधुमक्खी जैसी 'म्...' की ध्वनि निकालें। 7. पूरे समय ध्यान ध्वनि के कंपन पर रखें। 8. इस प्रक्रिया को 5 से 10 बार दोहराएं।
भ्रामरी प्राणायाम मन को तुरंत शांत करता है। तनाव, चिंता और गुस्सा कम करने में सहायक है। अच्छी नींद लाने में मदद करता है। एकाग्रता बढ़ाता है। रक्तचाप को संतुलित रखने में सहायता करता है। मानसिक थकान दूर होती है। ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ती है। मन में सकारात्मकता आती है।
सुबह या रात सोने से पहले करें। 5 से 10 राउंड पर्याप्त हैं। शांत वातावरण में अभ्यास करें और ध्वनि को धीरे-धीरे निकालें।
कुछ दिनों के अभ्यास से मानसिक शांति महसूस होने लगती है। नियमित 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर तनाव और चिंता में स्पष्ट कमी दिखाई देती है।
1. सुखासन या पद्मासन में सीधे बैठ जाएं। 2. आंखें बंद करें और शरीर को शांत रखें। 3. गले को हल्का संकुचित करें। 4. नाक से धीरे-धीरे सांस लें ताकि गले से हल्की ध्वनि उत्पन्न हो। 5. उसी प्रकार धीरे-धीरे नाक से सांस छोड़ें। 6. पूरी प्रक्रिया के दौरान सांस लंबी और नियंत्रित रखें। 7. मन को केवल श्वास पर केंद्रित रखें। 8. 5 से 10 मिनट तक अभ्यास करें।
उज्जायी प्राणायाम फेफड़ों को मजबूत बनाता है। शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में मदद करता है। मन शांत रहता है। तनाव कम होता है। ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। रक्त संचार बेहतर होता है। गले और श्वसन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर में ऊर्जा और संतुलन बना रहता है।
सुबह खाली पेट या ध्यान से पहले करें। शुरुआत में 5 मिनट तक करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। सांस को आरामदायक गति से लें और छोड़ें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर श्वास पर नियंत्रण बेहतर होने लगता है। लगभग 1 महीने में मानसिक शांति और फेफड़ों की क्षमता में सुधार महसूस होता है।
1. सीधे खड़े होकर नमस्कार मुद्रा से शुरुआत करें। 2. सांस लेते हुए हाथ ऊपर उठाकर पीछे की ओर झुकें। 3. सांस छोड़ते हुए आगे झुककर हाथ पैरों के पास रखें। 4. एक पैर पीछे ले जाकर अश्व संचालन मुद्रा में आएं। 5. दूसरा पैर पीछे ले जाकर दंडासन की स्थिति बनाएं। 6. अष्टांग नमस्कार और फिर भुजंगासन में आएं। 7. अधोमुख श्वानासन बनाएं और फिर एक-एक करके पैरों को आगे लाएं। 8. अंत में वापस खड़े होकर नमस्कार मुद्रा में आ जाएं।
सूर्य नमस्कार पूरे शरीर का संपूर्ण व्यायाम है। यह शरीर की लगभग सभी मांसपेशियों को सक्रिय करता है। रीढ़ मजबूत होती है। पाचन और रक्त संचार बेहतर होता है। वजन नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है। शरीर लचीला बनता है। फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। तनाव कम होता है और पूरे दिन ऊर्जा बनी रहती है।
सूर्योदय के समय खाली पेट करना सबसे अच्छा माना जाता है। शुरुआत में 3 से 5 चक्र करें और धीरे-धीरे 12 चक्र तक बढ़ाएं। प्रत्येक चरण को सही श्वास के साथ करें।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर अधिक चुस्त और लचीला महसूस होने लगता है। नियमित अभ्यास से वजन नियंत्रण, सहनशक्ति और संपूर्ण स्वास्थ्य में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच लगभग 3 से 4 फीट की दूरी रखें। 2. दाएं पैर को आगे और बाएं पैर को थोड़ा बाहर की ओर रखें। 3. दाएं घुटने को मोड़ें ताकि जांघ जमीन के समानांतर आने लगे। 4. दोनों हाथों को सिर के ऊपर सीधा उठाकर नमस्कार मुद्रा बनाएं। 5. रीढ़ को सीधा रखें और सामने की ओर देखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 7. सांस लेते हुए वापस सामान्य स्थिति में आएं। 8. दूसरी ओर भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
वीरभद्रासन पैरों, जांघों और कंधों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बेहतर करता है। रीढ़ सीधी रहती है। छाती खुलती है जिससे श्वास बेहतर होती है। सहनशक्ति बढ़ती है। मानसिक आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करता है। शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। लंबे समय तक खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। शुरुआत में कम समय तक रुकें और धीरे-धीरे अवधि बढ़ाएं। घुटनों में गंभीर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों की मजबूती और संतुलन में सुधार महसूस होने लगता है।
1. पैरों के बीच लगभग 4 फीट की दूरी रखें। 2. दाएं पैर को 90 डिग्री बाहर और बाएं पैर को थोड़ा अंदर घुमाएं। 3. दाएं घुटने को मोड़ें और दोनों हाथों को कंधों की सीध में फैलाएं। 4. दाएं हाथ की दिशा में देखें। 5. रीढ़ सीधी रखें और शरीर का संतुलन बनाए रखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 7. धीरे-धीरे वापस आएं। 8. दूसरी तरफ भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
यह आसन पैरों, कूल्हों और कंधों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन और लचीलापन बढ़ता है। कमर मजबूत होती है। एकाग्रता बढ़ती है। छाती खुलती है। सहनशक्ति में सुधार होता है। शरीर अधिक स्थिर महसूस करता है। नियमित अभ्यास से आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 राउंड करें। घुटनों और कूल्हों में दर्द होने पर धीरे-धीरे अभ्यास करें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन और पैरों की ताकत में सुधार दिखाई देने लगता है।
1. योगा मैट पर आराम से बैठ जाएं। 2. दोनों पैरों को क्रॉस करके सहज स्थिति बनाएं। 3. रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखें। 4. दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखें। 5. आंखें बंद करें और शरीर को ढीला छोड़ दें। 6. सामान्य गति से गहरी सांस लेते रहें। 7. मन को केवल श्वास पर केंद्रित रखें। 8. 5 से 15 मिनट तक आराम से बैठें।
सुखासन ध्यान और प्राणायाम के लिए उपयुक्त मुद्रा है। मानसिक तनाव कम करता है। मन को शांत रखता है। रीढ़ सीधी रखने की आदत बनती है। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर को आराम मिलता है। ध्यान लगाने में आसानी होती है। लंबे समय तक बैठने की क्षमता बढ़ती है।
सुबह या शाम शांत वातावरण में करें। ध्यान या प्राणायाम से पहले इसका अभ्यास करें। घुटनों में दर्द होने पर कुशन का उपयोग कर सकते हैं।
कुछ दिनों में मानसिक शांति महसूस होने लगती है। नियमित अभ्यास से ध्यान लगाने की क्षमता और बैठने की मुद्रा बेहतर होती है।
1. सीधे खड़े होकर शरीर का संतुलन बनाएं। 2. दाएं पैर पर शरीर का भार रखें और बाएं पैर को उसके चारों ओर लपेटें। 3. दोनों हाथों को सामने लाकर एक-दूसरे के चारों ओर लपेटें। 4. हथेलियों को आपस में मिलाने का प्रयास करें। 5. घुटनों को हल्का मोड़ें और सामने देखें। 6. सामान्य सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 7. धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौटें। 8. दूसरी तरफ भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
गरुड़ासन शरीर का संतुलन बढ़ाता है। पैरों और कंधों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। जोड़ों में लचीलापन आता है। एकाग्रता बढ़ती है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर का समन्वय सुधरता है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से संतुलन क्षमता बेहतर होती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। संतुलन न बने तो दीवार का सहारा लें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन और लचीलापन बेहतर महसूस होने लगता है।
1. दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं पैर को मोड़कर बाएं घुटने के बाहर रखें। 3. बाएं पैर को मोड़कर शरीर के पास रखें। 4. बाएं हाथ को दाएं घुटने के बाहर रखें। 5. दाएं हाथ को पीछे जमीन पर टिकाएं। 6. सांस लेते हुए रीढ़ को सीधा रखें और सांस छोड़ते हुए शरीर को दाईं ओर मोड़ें। 7. 20 से 30 सेकंड तक सामान्य सांस लेते हुए इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
अर्ध मत्स्येन्द्रासन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। कमर और पीठ की जकड़न कम करता है। पेट के अंगों की हल्की मालिश होती है। शरीर का लचीलापन बढ़ता है। रक्त संचार बेहतर होता है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से रीढ़ स्वस्थ और मजबूत रहती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर या रीढ़ की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर रीढ़ अधिक लचीली महसूस होती है तथा पाचन और कमर की कार्यक्षमता में सुधार दिखाई देता है।
1. योगा मैट पर दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं पैर को मोड़कर बाएं कूल्हे के पास रखें। 3. बाएं पैर को दाएं घुटने के ऊपर रखते हुए दाएं कूल्हे के पास रखें। 4. दाएं हाथ को ऊपर से पीछे और बाएं हाथ को नीचे से पीछे ले जाएं। 5. दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में पकड़ने का प्रयास करें। 6. रीढ़ को सीधा रखें और सामने देखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौटकर दूसरी ओर दोहराएं।
गोमुखासन कंधों और छाती को खोलने में मदद करता है। हाथों और बाजुओं की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। रीढ़ सीधी रहती है। कूल्हों और जांघों में लचीलापन बढ़ता है। पीठ का तनाव कम होता है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। लंबे समय तक बैठने से होने वाली अकड़न कम होती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। यदि हाथ पूरी तरह न मिलें तो बेल्ट या तौलिये की सहायता लें। कंधे में गंभीर चोट होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कंधों और कूल्हों में लचीलापन बढ़ने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच कंधों जितनी दूरी रखें। 2. धीरे-धीरे घुटनों को मोड़ते हुए बैठ जाएं। 3. दोनों हथेलियों को नमस्कार मुद्रा में छाती के सामने जोड़ें। 4. कोहनियों से घुटनों को हल्का बाहर की ओर दबाएं। 5. रीढ़ को सीधा रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 6. एड़ियों को जमीन पर टिकाने का प्रयास करें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे उठकर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
मालासन कूल्हों और पैरों को मजबूत बनाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। कब्ज की समस्या में लाभदायक माना जाता है। रीढ़ की लचक बढ़ती है। श्रोणि क्षेत्र मजबूत होता है। शरीर का संतुलन सुधरता है। कमर की जकड़न कम होती है। नियमित अभ्यास से बैठने की क्षमता बेहतर होती है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास करें। घुटनों की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर कूल्हों और पैरों में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को मिलाएं। 2. दोनों हाथों को कमर के पीछे रखें। 3. गहरी सांस लेते हुए छाती को ऊपर उठाएं। 4. धीरे-धीरे शरीर को पीछे की ओर झुकाएं। 5. गर्दन को आरामदायक स्थिति में रखें। 6. सामान्य सांस लेते हुए 15 से 20 सेकंड तक रुकें। 7. सांस लेते हुए धीरे-धीरे वापस सीधा हो जाएं। 8. 3 बार दोहराएं।
अर्ध चक्रासन रीढ़ को लचीला बनाता है। कमर और पीठ मजबूत होती है। छाती खुलती है। फेफड़ों की क्षमता बेहतर होती है। पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आता है। शरीर की मुद्रा सुधरती है। थकान कम होती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। 15 से 20 सेकंड तक रुकें। कमर दर्द होने पर धीरे-धीरे अभ्यास करें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर रीढ़ और कमर में लचीलापन बढ़ने लगता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं। 2. घुटनों को मोड़कर पैरों को कूल्हों के पास रखें। 3. दोनों हथेलियों को कंधों के पास जमीन पर रखें। 4. गहरी सांस लेते हुए शरीर को ऊपर उठाएं। 5. हाथों और पैरों पर शरीर का संतुलन बनाए रखें। 6. सिर को आराम से पीछे रखें। 7. 15 से 20 सेकंड तक सामान्य सांस लेते रहें। 8. धीरे-धीरे वापस जमीन पर आ जाएं।
चक्रासन पूरे शरीर को मजबूत बनाता है। रीढ़ की हड्डी लचीली होती है। हाथ, पैर और कंधे मजबूत होते हैं। छाती खुलती है। शरीर में ऊर्जा बढ़ती है। रक्त संचार बेहतर होता है। तनाव कम होता है। शरीर अधिक सक्रिय और फुर्तीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में विशेषज्ञ की देखरेख में करें। 2 से 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। गर्दन या कमर की गंभीर समस्या होने पर न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर अधिक मजबूत और लचीला महसूस होने लगता है।
1. पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाएं। 3. गहरी सांस लेते हुए हाथों को सिर के ऊपर उठाएं। 4. हथेलियों को ऊपर की ओर पलटें। 5. रीढ़ को सीधा रखते हुए शरीर को ऊपर की ओर खींचें। 6. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 7. सांस छोड़ते हुए हाथों को धीरे-धीरे नीचे लाएं। 8. 3 से 5 बार अभ्यास करें।
पर्वतासन रीढ़ की हड्डी को सीधा और मजबूत बनाता है। कंधों और हाथों में लचीलापन बढ़ता है। छाती खुलती है। शरीर की मुद्रा सुधरती है। एकाग्रता बढ़ती है। थकान कम होती है। शरीर में खिंचाव आने से लचीलापन बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक सक्रिय महसूस करता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 से 5 बार अभ्यास पर्याप्त है। कंधे में गंभीर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में खिंचाव और लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. योगा मैट पर दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दोनों घुटनों को मोड़कर पैरों के तलवों को आपस में मिलाएं। 3. दोनों हाथों से पैरों को मजबूती से पकड़ें। 4. रीढ़ को सीधा रखें और कंधों को ढीला छोड़ दें। 5. घुटनों को धीरे-धीरे ऊपर-नीचे तितली के पंखों की तरह हिलाएं। 6. इसके बाद घुटनों को नीचे की ओर दबाकर 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 7. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को सीधा करके सामान्य स्थिति में लौट आएं।
बद्ध कोणासन कूल्हों और जांघों में लचीलापन बढ़ाता है। घुटनों के जोड़ों को मजबूत बनाता है। पाचन क्रिया को बेहतर करने में मदद करता है। लंबे समय तक बैठने से होने वाली अकड़न कम होती है। श्रोणि क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ता है। कमर को आराम मिलता है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला और आरामदायक महसूस करता है।
सुबह खाली पेट या भोजन के 3 से 4 घंटे बाद करें। शुरुआत में 1 से 2 मिनट अभ्यास करें। प्रतिदिन 3 से 5 मिनट तक करना लाभदायक है। घुटनों में गंभीर चोट होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कूल्हों और जांघों में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को पास रखें। 2. गहरी सांस लें और हाथों को ऊपर उठाएं। 3. सांस छोड़ते हुए कमर से आगे की ओर झुकें। 4. दोनों हाथों से पैरों के पास जमीन या टखनों को पकड़ें। 5. सिर को घुटनों के पास लाने का प्रयास करें। 6. घुटनों को यथासंभव सीधा रखें। 7. 20 से 30 सेकंड तक सामान्य सांस लेते रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सीधी स्थिति में आ जाएं।
उत्तानासन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है। हैमस्ट्रिंग और पिंडलियों में अच्छा खिंचाव आता है। पाचन तंत्र बेहतर होता है। मानसिक तनाव कम करने में मदद करता है। शरीर का रक्त संचार बढ़ता है। कमर की जकड़न कम होती है। शरीर हल्का महसूस होता है। नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास करें। कमर या स्लिप डिस्क की समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन और हल्कापन महसूस होने लगता है।
1. पीठ के बल आराम से लेट जाएं। 2. दोनों घुटनों को मोड़कर छाती की ओर लाएं। 3. दोनों हाथों से पैरों के तलवों को पकड़ें। 4. घुटनों को बगल की ओर फैलाएं। 5. कमर को जमीन पर टिकाए रखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को छोड़कर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
आनंद बालासन कमर और कूल्हों को आराम देता है। रीढ़ की जकड़न कम होती है। शरीर में लचीलापन बढ़ता है। तनाव और थकान कम होती है। कूल्हों के जोड़ों की गतिशीलता बढ़ती है। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर हल्का महसूस होता है। योग अभ्यास के बाद विश्राम के लिए उपयोगी आसन है।
सुबह या शाम खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर में तेज दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और कूल्हों में आराम महसूस होने लगता है।
1. वज्रासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों की मुट्ठियां बनाकर नाभि के दोनों ओर रखें। 3. गहरी सांस लें। 4. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें। 5. पेट पर हल्का दबाव महसूस होने दें। 6. गर्दन सीधी रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस वज्रासन में आ जाएं।
मंडूकासन पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में सहायक है। गैस और अपच में लाभ मिल सकता है। अग्न्याशय को सक्रिय करने में मदद करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। कमर को हल्का खिंचाव मिलता है। शरीर का रक्त संचार बेहतर होता है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से पेट स्वस्थ रहता है।
सुबह खाली पेट करें। 3 से 5 बार अभ्यास करें। पेट की सर्जरी या अल्सर होने पर यह आसन न करें।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर पाचन में सुधार और पेट हल्का महसूस होने लगता है।
1. स्क्वाट की स्थिति में बैठ जाएं। 2. दोनों हथेलियों को कंधों की चौड़ाई पर जमीन पर रखें। 3. घुटनों को दोनों भुजाओं पर टिकाएं। 4. शरीर का भार धीरे-धीरे हाथों पर लाएं। 5. एक-एक करके दोनों पैरों को जमीन से ऊपर उठाएं। 6. सामने किसी एक बिंदु पर ध्यान रखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 10 से 20 सेकंड तक संतुलन बनाए रखें। 8. धीरे-धीरे पैरों को वापस जमीन पर रखें।
काकासन हाथों, कंधों और कलाइयों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। एकाग्रता और आत्मविश्वास में सुधार करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। मानसिक डर कम करने में मदद मिलती है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। नियमित अभ्यास से संतुलन क्षमता काफी बढ़ जाती है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में योग शिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें। 2 से 3 बार प्रयास करें। कलाई की चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन और हाथों की ताकत में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. वज्रासन में आराम से बैठ जाएं। 2. गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएं। 3. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें। 4. दोनों हाथों को सामने फैलाएं और माथे को जमीन पर टिकाएं। 5. कंधों और पीठ को ढीला छोड़ दें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 30 सेकंड से 1 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस लेते हुए धीरे-धीरे वापस वज्रासन में आ जाएं।
शशांकासन मानसिक तनाव कम करने में बहुत लाभदायक है। रीढ़ और कमर को आराम देता है। कंधों की जकड़न कम होती है। रक्त संचार बेहतर होता है। मन शांत रहता है। एकाग्रता बढ़ती है। थकान दूर होती है। नियमित अभ्यास से शरीर हल्का और तनावमुक्त महसूस करता है।
सुबह या शाम खाली पेट करें। 30 सेकंड से 1 मिनट तक रुकें। 3 बार अभ्यास करें। घुटनों में गंभीर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 1 से 2 सप्ताह अभ्यास करने पर तनाव कम महसूस होता है। लगभग 1 महीने में शरीर और मन अधिक शांत रहने लगते हैं।
1. वज्रासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखें। 3. गहरी सांस लें। 4. मुंह पूरा खोलें और जीभ को जितना हो सके बाहर निकालें। 5. आंखों को ऊपर की ओर देखें। 6. सांस छोड़ते हुए 'हा...' की आवाज निकालें। 7. कुछ सेकंड आराम करें। 8. इस प्रक्रिया को 5 से 7 बार दोहराएं।
सिंहासन गले और स्वर तंत्र को मजबूत बनाता है। चेहरे की मांसपेशियों का अच्छा व्यायाम होता है। तनाव कम होता है। आत्मविश्वास बढ़ता है। गले में रक्त संचार बेहतर होता है। जबड़ों की जकड़न कम होती है। श्वसन तंत्र को लाभ मिलता है। नियमित अभ्यास से आवाज स्पष्ट और प्रभावी बन सकती है।
सुबह खाली पेट करें। 5 से 7 बार अभ्यास पर्याप्त है। गले में दर्द होने पर धीरे-धीरे करें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर गले में आराम और चेहरे की मांसपेशियों में सक्रियता महसूस होती है।
1. जमीन पर बैठकर दोनों पैरों के तलवों को आपस में मिलाएं। 2. दोनों हाथों से पैरों को पकड़ लें। 3. रीढ़ को सीधा रखें। 4. दोनों घुटनों को धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हिलाएं। 5. गति आरामदायक रखें और शरीर पर जोर न दें। 6. सामान्य सांस लेते रहें। 7. 1 से 3 मिनट तक अभ्यास करें। 8. अंत में पैरों को सीधा करके विश्राम करें।
तितली आसन कूल्हों और जांघों को लचीला बनाता है। घुटनों के जोड़ों की गतिशीलता बढ़ाता है। कमर को आराम देता है। पाचन में सहायता करता है। लंबे समय तक बैठने से होने वाली अकड़न कम होती है। शरीर हल्का महसूस होता है। महिलाओं के लिए भी यह लाभदायक माना जाता है। नियमित अभ्यास से बैठने की क्षमता बढ़ती है।
सुबह या शाम खाली पेट करें। 2 से 5 मिनट तक अभ्यास करें। घुटनों की चोट होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर कूल्हों और जांघों में लचीलापन बढ़ने लगता है।
1. वज्रासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों का सहारा लेते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकें। 3. पहले कोहनियों और फिर पीठ को जमीन पर टिकाएं। 4. यदि संभव हो तो सिर को भी जमीन पर रखें। 5. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 6. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 7. हाथों का सहारा लेकर धीरे-धीरे वापस उठें। 8. कुछ क्षण वज्रासन में विश्राम करें।
सुप्त वज्रासन जांघों और पेट की मांसपेशियों में अच्छा खिंचाव लाता है। रीढ़ की लचक बढ़ाता है। पाचन तंत्र को लाभ पहुंचाता है। छाती खुलती है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। कमर मजबूत होती है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में कम समय तक रुकें। घुटनों या कमर की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन और कमर की मजबूती महसूस होने लगती है।
1. पद्मासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों को पीठ के पीछे पकड़ लें या घुटनों पर रखें। 3. गहरी सांस लें। 4. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें। 5. माथे को जमीन के जितना पास ला सकें, लाएं। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस लेते हुए धीरे-धीरे वापस सीधा बैठ जाएं।
योग मुद्रा आसन पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। रीढ़ की हड्डी लचीली बनती है। मानसिक तनाव कम होता है। ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। कमर और कंधों को आराम मिलता है। नियमित अभ्यास से मन शांत और स्थिर रहता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। घुटनों या कमर की गंभीर समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर पाचन और मानसिक शांति में सुधार महसूस होने लगता है।
1. घुटनों के बल बैठकर दोनों हथेलियों को जमीन पर रखें और उंगलियों को पैरों की ओर रखें। 2. दोनों कोहनियों को पेट के बीच नाभि के पास टिकाएं। 3. शरीर का भार धीरे-धीरे हाथों पर लाएं। 4. एक-एक करके दोनों पैरों को पीछे सीधा करें। 5. संतुलन बनाते हुए दोनों पैरों को जमीन से ऊपर उठाएं। 6. सिर, धड़ और पैर एक सीध में रखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 10 से 20 सेकंड तक रुकें। 8. धीरे-धीरे पैरों को नीचे लाकर आराम करें।
मयूरासन हाथों, कंधों और कलाइयों को मजबूत बनाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का संतुलन और नियंत्रण बढ़ता है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक मजबूत और फुर्तीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में योग प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें। 2 से 3 बार पर्याप्त है। हर्निया, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था या कलाई की चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर हाथों की ताकत और शरीर का संतुलन बेहतर महसूस होने लगता है।
1. दोनों पैरों को फैलाकर जमीन पर बैठ जाएं। 2. घुटनों को हल्का मोड़ें और शरीर को आगे झुकाएं। 3. दोनों हाथों को घुटनों के नीचे से बाहर निकालें। 4. हाथों को दोनों ओर सीधा फैलाएं। 5. सिर और छाती को धीरे-धीरे नीचे झुकाएं। 6. शरीर को आरामदायक स्थिति में रखें। 7. सामान्य सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में लौट आएं।
कूर्मासन रीढ़ और पैरों को लचीला बनाता है। कमर की जकड़न कम करता है। मानसिक तनाव दूर करने में मदद करता है। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर को गहरा आराम मिलता है। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर हल्का महसूस होता है। नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। कमर या घुटनों की गंभीर समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर अधिक लचीला और आरामदायक महसूस होने लगता है।
1. स्क्वाट की स्थिति में बैठ जाएं। 2. दोनों हथेलियों को कंधों की चौड़ाई पर जमीन पर रखें। 3. घुटनों को ऊपरी भुजाओं पर टिकाएं। 4. धीरे-धीरे शरीर का भार हाथों पर लाएं। 5. दोनों पैरों को जमीन से ऊपर उठाकर संतुलन बनाएं। 6. सामने एक बिंदु पर नजर रखें। 7. 10 से 20 सेकंड तक सामान्य सांस लेते रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को नीचे रखकर विश्राम करें।
बकासन हाथों, कंधों और कलाइयों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। एकाग्रता और आत्मविश्वास विकसित करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। मानसिक डर कम होता है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। नियमित अभ्यास से संतुलन क्षमता बढ़ती है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें। कलाई की चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर हाथों की ताकत और संतुलन में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. घुटनों के बल बैठकर एक पैर आगे रखें। 2. धीरे-धीरे आगे वाले पैर को आगे और पीछे वाले पैर को पीछे सरकाएं। 3. दोनों पैरों को एक सीध में फैलाने का प्रयास करें। 4. दोनों हाथों का सहारा जमीन पर रखें। 5. शरीर को बिना जोर लगाए धीरे-धीरे नीचे लाएं। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में लौट आएं।
हनुमानासन पैरों और कूल्हों में अत्यधिक लचीलापन लाता है। हैमस्ट्रिंग मजबूत होती हैं। शरीर का संतुलन बढ़ता है। रीढ़ को लाभ मिलता है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है। मानसिक धैर्य विकसित होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। पहले वार्म-अप अवश्य करें। शुरुआती लोग विशेषज्ञ की देखरेख में अभ्यास करें। मांसपेशियों में खिंचाव होने पर तुरंत रुक जाएं।
लगातार 1 से 2 महीने अभ्यास करने पर शरीर में अच्छा लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. दीवार के पास बैठ जाएं। 2. पीठ के बल लेटते हुए दोनों पैरों को दीवार पर ऊपर की ओर रखें। 3. शरीर को आरामदायक स्थिति में रखें। 4. दोनों हाथों को शरीर के बगल में रखें। 5. आंखें बंद करें और सामान्य गति से सांस लें। 6. पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। 7. 5 से 10 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को नीचे लाकर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
विपरीत करनी आसन पैरों की थकान दूर करता है। रक्त संचार बेहतर बनाता है। सूजन कम करने में मदद करता है। मानसिक तनाव और चिंता कम होती है। कमर को आराम मिलता है। शरीर में नई ऊर्जा आती है। अच्छी नींद में सहायता करता है। लंबे समय तक खड़े रहने वालों के लिए यह अत्यंत लाभदायक आसन है।
सुबह या शाम किसी भी समय किया जा सकता है। भोजन के तुरंत बाद न करें। 5 से 10 मिनट तक आराम से रहें। गंभीर ग्लूकोमा या गर्दन की समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
कुछ दिनों के अभ्यास से पैरों की थकान कम होने लगती है। लगभग 2 से 3 सप्ताह में शरीर अधिक आरामदायक और तनावमुक्त महसूस होता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच लगभग 3 से 4 फीट की दूरी रखें। 2. दोनों हाथों को कमर पर रखें और रीढ़ को सीधा रखें। 3. गहरी सांस लें और सांस छोड़ते हुए कमर से आगे की ओर झुकें। 4. दोनों हथेलियों को जमीन पर रखें या टखनों को पकड़ें। 5. सिर को धीरे-धीरे जमीन की ओर ले जाएं। 6. घुटनों को यथासंभव सीधा रखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. सांस लेते हुए धीरे-धीरे वापस खड़े हो जाएं।
यह आसन पैरों, कमर और रीढ़ को लचीला बनाता है। हैमस्ट्रिंग की जकड़न कम करता है। शरीर का रक्त संचार बढ़ाता है। मानसिक तनाव कम करने में सहायक है। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर हल्का महसूस होता है। नियमित अभ्यास से संतुलन और लचीलापन दोनों बढ़ते हैं।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें और 3 बार अभ्यास करें। कमर की गंभीर समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों और कमर में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. अधोमुख श्वानासन से शुरुआत करें। 2. दाएं घुटने को आगे लाकर दोनों हाथों के बीच रखें। 3. बाएं पैर को पीछे की ओर सीधा फैलाएं। 4. कूल्हों को जमीन की ओर संतुलित रखें। 5. रीढ़ को सीधा रखें या धीरे-धीरे आगे झुकें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
यह आसन कूल्हों में गहरा खिंचाव लाता है। रीढ़ और कमर को लचीला बनाता है। जांघों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। लंबे समय तक बैठने से होने वाली जकड़न कम होती है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। मानसिक तनाव कम होता है। शरीर अधिक लचीला महसूस करता है। नियमित अभ्यास से कूल्हों की गतिशीलता बढ़ती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। घुटनों या कूल्हों में चोट होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर कूल्हों और कमर में अच्छा लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. घुटनों के बल सीधे खड़े हो जाएं। 2. दाएं पैर को एक ओर सीधा फैलाएं। 3. गहरी सांस लेते हुए बाएं हाथ को ऊपर उठाएं। 4. सांस छोड़ते हुए दाईं ओर झुकें। 5. दायां हाथ पैर पर रखें और बायां हाथ सिर के ऊपर रखें। 6. छाती को खुला रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
परिघासन कमर और शरीर के दोनों किनारों में अच्छा खिंचाव लाता है। रीढ़ की लचक बढ़ाता है। छाती और फेफड़ों को फैलाता है। पाचन क्रिया में सहायता करता है। शरीर का संतुलन बेहतर बनाता है। कमर दर्द की जकड़न कम करने में मदद करता है। रक्त संचार बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर में गंभीर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और शरीर के किनारों में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. पैरों के बीच लगभग 4 फीट की दूरी रखें। 2. दाएं पैर को 90 डिग्री बाहर घुमाएं। 3. दाएं घुटने को मोड़ें। 4. दाएं हाथ को जमीन या पैर के पास रखें। 5. बाएं हाथ को सिर के ऊपर से सीधा फैलाएं। 6. छाती को खुला रखें और ऊपर देखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर दोहराएं।
यह आसन पैरों, कमर और कंधों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। कूल्हों में लचीलापन लाता है। छाती खुलती है। पाचन बेहतर होता है। शरीर का रक्त संचार बढ़ता है। सहनशक्ति बढ़ती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक मजबूत और सक्रिय बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। घुटनों की चोट होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन और लचीलापन बेहतर महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर शरीर का संतुलन बनाएं। 2. दाएं पैर को पीछे मोड़कर दाएं हाथ से टखना पकड़ें। 3. बाएं हाथ को सामने की ओर सीधा फैलाएं। 4. धीरे-धीरे पीछे वाले पैर को ऊपर उठाएं। 5. शरीर का संतुलन बनाए रखें और सामने देखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
नटराजासन शरीर का संतुलन और एकाग्रता बढ़ाता है। पैरों और पीठ की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। रीढ़ लचीली बनती है। छाती और कंधों में खिंचाव आता है। आत्मविश्वास बढ़ता है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। मानसिक स्थिरता बढ़ती है। नियमित अभ्यास से शरीर की मुद्रा बेहतर होती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। संतुलन न बने तो दीवार का सहारा लें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन, लचीलापन और आत्मविश्वास में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को पास रखें। 2. गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएं। 3. सांस छोड़ते हुए घुटनों को मोड़ें जैसे कुर्सी पर बैठ रहे हों। 4. पीठ को सीधा रखें और घुटनों को पंजों से आगे न जाने दें। 5. हाथों को सीधा रखें और सामने देखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस लेते हुए धीरे-धीरे वापस खड़े हो जाएं।
उत्कटासन जांघों, घुटनों और पिंडलियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है। पेट और कमर की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। सहनशक्ति बढ़ती है। शरीर में ऊर्जा आती है। अतिरिक्त कैलोरी जलाने में सहायता करता है। नियमित अभ्यास से पैरों की ताकत बढ़ती है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 से 5 बार अभ्यास करें। घुटनों में गंभीर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों की मजबूती और संतुलन में सुधार महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर पैरों के बीच लगभग 3 फीट की दूरी रखें। 2. दाएं हाथ को जमीन पर रखें। 3. बाएं पैर को पीछे से ऊपर उठाएं। 4. बाएं हाथ को सीधा ऊपर की ओर फैलाएं। 5. शरीर का संतुलन एक पैर और एक हाथ पर बनाए रखें। 6. सामने या ऊपर देखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
अर्ध चंद्रासन संतुलन और एकाग्रता बढ़ाता है। पैरों और कूल्हों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। रीढ़ लचीली बनती है। कमर को मजबूती मिलती है। शरीर का समन्वय बेहतर होता है। तनाव कम होता है। रक्त संचार बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक स्थिर और लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। संतुलन न बने तो दीवार का सहारा लें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन और शरीर की स्थिरता में सुधार दिखाई देता है।
1. सीधे खड़े होकर एक पैर आगे और दूसरा पीछे रखें। 2. दोनों कूल्हों को सामने की ओर रखें। 3. गहरी सांस लें और रीढ़ को सीधा रखें। 4. सांस छोड़ते हुए आगे वाले पैर की ओर झुकें। 5. दोनों हाथों को जमीन या पैर पर रखें। 6. सिर को घुटने के पास लाने का प्रयास करें। 7. 20 से 30 सेकंड तक सामान्य सांस लेते रहें। 8. वापस आकर दूसरी तरफ अभ्यास करें।
पार्श्वोत्तानासन रीढ़ और पैरों में लचीलापन बढ़ाता है। हैमस्ट्रिंग मजबूत होती हैं। पाचन क्रिया बेहतर होती है। कमर की जकड़न कम होती है। संतुलन और एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का रक्त संचार बेहतर होता है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर दर्द होने पर धीरे-धीरे करें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों और कमर में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच हल्की दूरी रखें। 2. दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाकर सिर के ऊपर उठाएं। 3. गहरी सांस लें और शरीर को ऊपर की ओर खींचें। 4. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे दाईं ओर झुकें। 5. कुछ सेकंड रुकें और फिर बीच में आएं। 6. अब यही प्रक्रिया बाईं ओर दोहराएं। 7. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 8. दोनों ओर 5 से 10 बार अभ्यास करें।
तिर्यक ताड़ासन कमर और शरीर के दोनों किनारों को लचीला बनाता है। रीढ़ को मजबूत करता है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायक माना जाता है। पाचन तंत्र सक्रिय होता है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। रक्त संचार बढ़ता है। शरीर हल्का महसूस होता है। नियमित अभ्यास से कमर की जकड़न कम होती है।
सुबह खाली पेट करें। 5 से 10 राउंड पर्याप्त हैं। शरीर को झटके से न मोड़ें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर अधिक लचीली और शरीर हल्का महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को मिलाएं। 2. गहरी सांस लेते हुए हाथों को ऊपर उठाएं। 3. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें। 4. दोनों हथेलियों को पैरों के नीचे रखने का प्रयास करें। 5. सिर को घुटनों के पास लाएं। 6. घुटनों को यथासंभव सीधा रखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे वापस खड़े हो जाएं।
पादहस्तासन रीढ़ की हड्डी और पैरों को लचीला बनाता है। पाचन तंत्र बेहतर होता है। कमर की जकड़न कम होती है। हैमस्ट्रिंग मजबूत होती हैं। रक्त संचार बढ़ता है। मानसिक तनाव कम होता है। शरीर हल्का और ऊर्जावान महसूस करता है। नियमित अभ्यास से शरीर की मुद्रा में सुधार आता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। स्लिप डिस्क या गंभीर कमर दर्द होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर, रीढ़ और पैरों में लचीलापन स्पष्ट रूप से बढ़ने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर आगे झुकें और दोनों हथेलियों को जमीन पर रखें। 2. दाएं पैर को जितना हो सके पीछे ले जाएं। 3. बाएं घुटने को 90 डिग्री पर मोड़कर रखें। 4. दाएं घुटने को जमीन पर टिकाएं। 5. छाती को आगे उठाएं और सामने देखें। 6. रीढ़ को सीधा रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
अश्व संचालनासन पैरों और कूल्हों को मजबूत बनाता है। रीढ़ की हड्डी में लचीलापन बढ़ाता है। छाती खुलती है जिससे श्वास बेहतर होती है। संतुलन और शरीर का समन्वय बढ़ता है। जांघों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर अधिक सक्रिय महसूस करता है। नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। घुटनों में दर्द होने पर मुलायम मैट का उपयोग करें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों और कूल्हों में लचीलापन तथा मजबूती महसूस होने लगती है।
1. लंज की स्थिति में आएं और पीछे वाले घुटने को जमीन पर रखें। 2. आगे वाले घुटने को टखने के ऊपर रखें। 3. गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएं। 4. हथेलियों को आमने-सामने रखें। 5. कूल्हों को धीरे-धीरे नीचे की ओर दबाएं। 6. छाती को ऊपर उठाकर सामने देखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर अभ्यास करें।
अंजनेयासन कूल्हों और जांघों में अच्छा खिंचाव लाता है। पैरों की ताकत बढ़ाता है। रीढ़ को लचीला बनाता है। छाती और कंधे खुलते हैं। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। रक्त संचार बढ़ता है। लंबे समय तक बैठने से होने वाली जकड़न कम होती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक फुर्तीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। घुटनों में दर्द होने पर नीचे कंबल रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कूल्हों और पैरों में लचीलापन बढ़ने लगता है।
1. जमीन पर बैठकर दोनों पैरों को सामने फैलाएं। 2. दोनों हाथों को शरीर के पास रखें। 3. गहरी सांस लेते हुए दोनों पैरों को ऊपर उठाएं। 4. शरीर को पीछे की ओर हल्का झुकाएं। 5. दोनों हाथों को पैरों की ओर सीधा फैलाएं। 6. शरीर को 'V' आकार में संतुलित रखें। 7. सामान्य सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 8. धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं।
पूर्ण नौकासन पेट और कमर की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। पाचन क्रिया बेहतर होती है। अतिरिक्त पेट की चर्बी कम करने में सहायक माना जाता है। रीढ़ मजबूत होती है। सहनशक्ति बढ़ती है। शरीर में ऊर्जा आती है। नियमित अभ्यास से कोर मसल्स मजबूत होती हैं।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। हर्निया या गंभीर कमर दर्द होने पर यह आसन न करें।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर पेट और कमर की मजबूती स्पष्ट महसूस होने लगती है।
1. पीठ के बल आराम से लेट जाएं। 2. दोनों पैरों के तलवों को आपस में मिलाएं। 3. घुटनों को दोनों ओर आराम से गिरने दें। 4. दोनों हाथों को शरीर के बगल में रखें। 5. आंखें बंद करें और शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ दें। 6. सामान्य गति से गहरी सांस लेते रहें। 7. 2 से 5 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को सीधा करके विश्राम करें।
सुप्त बद्ध कोणासन शरीर और मन को गहरा आराम देता है। कूल्हों और जांघों में लचीलापन बढ़ाता है। तनाव और थकान कम करता है। कमर को आराम देता है। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। रक्त संचार बेहतर होता है। ध्यान और विश्राम के लिए उपयोगी है। नियमित अभ्यास से मानसिक शांति बढ़ती है।
सुबह, शाम या योग सत्र के अंत में करें। 2 से 5 मिनट तक आराम से रहें। घुटनों में दर्द होने पर नीचे तकिया रख सकते हैं।
कुछ दिनों के अभ्यास से शरीर अधिक आरामदायक महसूस होने लगता है। नियमित अभ्यास से तनाव और थकान में कमी आती है।
1. प्लैंक की स्थिति से शुरुआत करें। 2. शरीर का भार दाएं हाथ और दाएं पैर पर रखें। 3. बाएं पैर को दाएं पैर के ऊपर रखें। 4. बाएं हाथ को सीधा ऊपर उठाएं। 5. पूरे शरीर को एक सीध में रखें। 6. सामने या ऊपर देखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 15 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. दूसरी ओर भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
वशिष्ठासन हाथों, कंधों और कोर मसल्स को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। कलाइयों की ताकत बढ़ती है। रीढ़ मजबूत होती है। एकाग्रता में सुधार होता है। सहनशक्ति बढ़ती है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। नियमित अभ्यास से पूरे शरीर की स्थिरता बढ़ती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कलाई या कंधे की चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर हाथों की ताकत, संतुलन और शरीर की स्थिरता में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. दोनों पैरों को सामने फैलाकर सीधे बैठ जाएं। 2. दोनों हथेलियों को कूल्हों के पीछे जमीन पर रखें। 3. उंगलियों का रुख पैरों की ओर रखें। 4. गहरी सांस लेते हुए कूल्हों को ऊपर उठाएं। 5. सिर को धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकाएं। 6. शरीर को एड़ियों से कंधों तक सीधी रेखा में रखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे वापस बैठ जाएं।
पूर्वोत्तानासन कंधों, हाथों और कलाइयों को मजबूत बनाता है। छाती और फेफड़ों को फैलाता है। रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है। पेट और कमर की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। शरीर का संतुलन बढ़ता है। थकान कम होती है। रक्त संचार बेहतर होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक मजबूत और ऊर्जावान बनता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। कलाई या कंधे की चोट होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर हाथों और कंधों की मजबूती महसूस होने लगती है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच 3 से 4 फीट की दूरी रखें। 2. दाएं पैर को आगे रखें और बाएं पैर को थोड़ा अंदर की ओर घुमाएं। 3. दोनों हाथों को कंधों की सीध में फैलाएं। 4. सांस छोड़ते हुए शरीर को दाईं ओर मोड़ें। 5. बाएं हाथ को दाएं पैर के पास रखें। 6. दाएं हाथ को ऊपर उठाकर उसकी ओर देखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर यही प्रक्रिया दोहराएं।
परिवृत्त त्रिकोणासन रीढ़ को लचीला बनाता है। कमर और पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। पाचन तंत्र सक्रिय होता है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। कंधों और पैरों में खिंचाव आता है। रक्त संचार बढ़ता है। मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक चुस्त और लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर की गंभीर समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर रीढ़ और कमर में लचीलापन बढ़ने लगता है।
1. लंज की स्थिति से शुरुआत करें। 2. आगे वाले घुटने को मोड़कर रखें। 3. दोनों हथेलियों को नमस्कार मुद्रा में जोड़ें। 4. शरीर को आगे वाले पैर की ओर मोड़ें। 5. विपरीत कोहनी को घुटने के बाहर टिकाएं। 6. रीढ़ को लंबा रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर दोहराएं।
यह आसन रीढ़ और कमर को मजबूत बनाता है। पाचन क्रिया बेहतर करता है। पैरों और कूल्हों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। संतुलन और एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का लचीलापन बढ़ता है। रक्त संचार बेहतर होता है। पेट की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक स्थिर महसूस होता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। घुटनों और कमर में दर्द होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन और शरीर की लचक में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. पद्मासन लगाकर बैठ जाएं। 2. धीरे-धीरे पीठ के बल लेट जाएं। 3. दोनों हथेलियों को कूल्हों के नीचे रखें। 4. कोहनियों का सहारा लेकर शरीर को हल्का ऊपर उठाएं। 5. संतुलन बनाए रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 6. गर्दन पर अधिक दबाव न आने दें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में आ जाएं।
तोलांगुलासन हाथों और पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। रीढ़ को मजबूती मिलती है। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। सहनशक्ति बढ़ती है। एकाग्रता विकसित होती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक मजबूत महसूस होता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में कम समय तक अभ्यास करें। गर्दन या कमर की समस्या होने पर सावधानी रखें।
लगातार 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन और कोर मसल्स की ताकत बढ़ने लगती है।
1. सीधे खड़े होकर शरीर का संतुलन बनाएं। 2. दाएं घुटने को मोड़कर छाती की ओर उठाएं। 3. दाएं हाथ से पैर के अंगूठे को पकड़ें। 4. धीरे-धीरे पैर को सामने सीधा करें। 5. बाएं हाथ को बगल में फैलाकर संतुलन बनाए रखें। 6. सामने किसी एक बिंदु पर नजर रखें। 7. सामान्य सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे वापस आएं और दूसरी ओर दोहराएं।
यह आसन संतुलन और एकाग्रता बढ़ाता है। पैरों और टखनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। हैमस्ट्रिंग में लचीलापन आता है। रीढ़ सीधी रहती है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। आत्मविश्वास बढ़ता है। रक्त संचार बेहतर होता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक स्थिर और फुर्तीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। शुरुआत में दीवार का सहारा ले सकते हैं।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन, लचीलापन और पैरों की मजबूती में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं और दोनों पैरों को मोड़ लें। 2. एड़ियों को नितंबों के पास लाएं। 3. दोनों हाथों से टखनों को पकड़ें। 4. गहरी सांस लेते हुए कमर और छाती को ऊपर उठाएं। 5. कंधों और पैरों पर शरीर का संतुलन बनाए रखें। 6. गर्दन को सीधा रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे वापस जमीन पर आ जाएं।
कंधरासन रीढ़ की हड्डी और कमर को मजबूत बनाता है। छाती और फेफड़ों को फैलाता है। गर्दन और कंधों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। रक्त संचार बढ़ता है। थकान कम होती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला और सक्रिय बनता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास करें। गर्दन या कमर की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और रीढ़ की मजबूती महसूस होने लगती है।
1. दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं पैर को मोड़कर बाएं घुटने के पास रखें। 3. बाएं हाथ को दाएं घुटने पर रखें। 4. दाएं हाथ को पीछे जमीन पर टिकाएं। 5. सांस छोड़ते हुए शरीर को दाईं ओर मोड़ें। 6. रीढ़ को सीधा रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर यही प्रक्रिया दोहराएं।
मेरु वक्रासन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है। कमर दर्द में राहत दिलाने में सहायक है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। पीठ की जकड़न कम होती है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। पेट की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से रीढ़ स्वस्थ रहती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर की गंभीर समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और रीढ़ में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. पीठ के बल सीधे लेट जाएं। 2. दाएं पैर को ऊपर उठाएं। 3. दाएं हाथ से पैर के अंगूठे को पकड़ें या योग बेल्ट का उपयोग करें। 4. बाएं पैर को सीधा जमीन पर रखें। 5. घुटने को सीधा रखने का प्रयास करें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर दोहराएं।
सुप्त पादांगुष्ठासन हैमस्ट्रिंग और पिंडलियों में लचीलापन बढ़ाता है। कमर को आराम देता है। पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। कूल्हों की गतिशीलता बढ़ती है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर की जकड़न कम होती है। संतुलन और लचीलापन बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक आरामदायक महसूस करता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों पैरों से 2 से 3 बार अभ्यास करें। हैमस्ट्रिंग में अधिक खिंचाव न दें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों और कमर में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को मिलाएं। 2. गहरी सांस लें और आगे की ओर झुकें। 3. दोनों हाथों से पैरों के अंगूठों को पकड़ें। 4. कोहनियों को हल्का मोड़ते हुए शरीर को पैरों के पास लाएं। 5. घुटनों को सीधा रखने का प्रयास करें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस खड़े हो जाएं।
पादांगुष्ठासन रीढ़ और पैरों को लचीला बनाता है। हैमस्ट्रिंग मजबूत होती हैं। पाचन क्रिया बेहतर होती है। कमर दर्द की जकड़न कम होती है। रक्त संचार बढ़ता है। मानसिक तनाव कम होता है। शरीर हल्का महसूस करता है। नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास करें। गंभीर कमर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का लचीलापन स्पष्ट रूप से बढ़ने लगता है।
1. दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं हाथ से दाएं पैर का अंगूठा पकड़ें। 3. बाएं हाथ से बाएं पैर का अंगूठा पकड़ें। 4. दाएं पैर को धनुष खींचने की तरह कान की ओर लाएं। 5. बाएं पैर को सीधा रखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर यही प्रक्रिया दोहराएं।
आकर्ण धनुरासन पैरों और हाथों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। रीढ़ की हड्डी में लचीलापन बढ़ाता है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। कंधों और जांघों में खिंचाव आता है। एकाग्रता बढ़ती है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। नियमित अभ्यास से समन्वय और नियंत्रण बेहतर होता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। शुरुआती लोग बिना जोर लगाए धीरे-धीरे अभ्यास करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन, लचीलापन और मांसपेशियों की मजबूती में सुधार दिखाई देता है।
1. पद्मासन में बैठकर दोनों पैरों को अच्छी तरह स्थिर करें। 2. धीरे-धीरे दोनों हाथों को जांघ और पिंडली के बीच से बाहर निकालें। 3. कोहनियों तक हाथ बाहर आने दें। 4. दोनों हाथों को ऊपर उठाकर कानों को हल्के से पकड़ें। 5. रीढ़ को सीधा रखें और शरीर का संतुलन बनाए रखें। 6. आंखें सामने रखें और सामान्य गति से सांस लें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे हाथ निकालकर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
गर्भासन शरीर का संतुलन और लचीलापन बढ़ाता है। कूल्हों और घुटनों के जोड़ों को मजबूत बनाता है। पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करता है। मानसिक एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का समन्वय बेहतर होता है। तनाव कम करने में सहायता मिलती है। ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक संतुलित और लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में कम समय तक रुकें। पद्मासन में सहज होने के बाद ही इसका अभ्यास करें। घुटनों में चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन और लचीलापन बेहतर महसूस होने लगता है।
1. पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हथेलियों को कूल्हों के पास जमीन पर रखें। 3. गहरी सांस लेकर हाथों पर शरीर का भार डालें। 4. पूरे शरीर को जमीन से ऊपर उठाने का प्रयास करें। 5. कंधों को मजबूत रखें और पेट की मांसपेशियों को कसें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 10 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस बैठ जाएं।
लोलासन हाथों, कंधों और कलाइयों को मजबूत बनाता है। पेट और कोर मसल्स की ताकत बढ़ाता है। शरीर का संतुलन बेहतर करता है। एकाग्रता विकसित होती है। शरीर का नियंत्रण बढ़ता है। सहनशक्ति में सुधार होता है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। नियमित अभ्यास से ऊपरी शरीर मजबूत होता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें। कलाई में दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर हाथों और कोर मसल्स की मजबूती स्पष्ट महसूस होने लगती है।
1. दोनों पैरों को जितना आराम से हो सके फैलाकर बैठ जाएं। 2. रीढ़ को सीधा रखें और गहरी सांस लें। 3. सांस छोड़ते हुए शरीर को धीरे-धीरे आगे झुकाएं। 4. दोनों हाथों को सामने फैलाएं। 5. माथे या ठुड्डी को जमीन के जितना पास ला सकें लाएं। 6. शरीर पर अधिक जोर न दें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे वापस बैठ जाएं।
भूनमनासन कूल्हों, कमर और पैरों में गहरा खिंचाव लाता है। रीढ़ को लचीला बनाता है। पाचन क्रिया में सहायता करता है। मानसिक तनाव कम करता है। शरीर का लचीलापन बढ़ता है। रक्त संचार बेहतर होता है। जांघों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक आरामदायक महसूस करता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। शरीर को जबरदस्ती नीचे न झुकाएं।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर और कूल्हों में अच्छा लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. पेट के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों हथेलियों को कंधों के पास रखें। 3. गहरी सांस लेते हुए धीरे-धीरे शरीर को ऊपर उठाएं। 4. कमर को पीछे की ओर अधिक मोड़ते हुए सिर को पैरों की दिशा में ले जाएं। 5. कोहनियों को यथासंभव सीधा रखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में लौट आएं।
पूर्ण भुजंगासन रीढ़ की हड्डी को अत्यधिक लचीला बनाता है। छाती और फेफड़ों को फैलाता है। पेट की मांसपेशियों में गहरा खिंचाव आता है। कंधे और हाथ मजबूत होते हैं। शरीर की मुद्रा बेहतर होती है। रक्त संचार बढ़ता है। शरीर में ऊर्जा आती है। नियमित अभ्यास से रीढ़ मजबूत और लचीली रहती है।
सुबह खाली पेट करें। केवल तब करें जब सामान्य भुजंगासन में अच्छी पकड़ हो। गंभीर कमर दर्द या रीढ़ की समस्या होने पर यह आसन न करें।
लगातार 1 से 2 महीने अभ्यास करने पर रीढ़ की लचक और शरीर की मजबूती में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. पेट के बल सीधे लेट जाएं। 2. दोनों हाथों को जांघों के नीचे रखें। 3. ठुड्डी को जमीन पर टिकाएं। 4. गहरी सांस लेते हुए दोनों पैरों को एक साथ ऊपर उठाएं। 5. घुटनों को बिल्कुल सीधा रखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते हुए 20 से 30 सेकंड तक रहें। 7. धीरे-धीरे पैरों को नीचे लाएं। 8. कुछ सेकंड विश्राम करके दोबारा अभ्यास करें।
पूर्ण शलभासन कमर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। रीढ़ की हड्डी को लचीला रखता है। कूल्हों और जांघों की ताकत बढ़ाता है। पेट की अतिरिक्त चर्बी कम करने में सहायता करता है। पाचन तंत्र बेहतर होता है। शरीर का संतुलन बढ़ता है। रक्त संचार बेहतर होता है। नियमित अभ्यास से कमर अधिक मजबूत और स्वस्थ रहती है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 3 बार अभ्यास पर्याप्त है। गर्भावस्था या गंभीर कमर दर्द में इसका अभ्यास न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर, पीठ और पैरों की मजबूती में स्पष्ट सुधार महसूस होने लगता है।
1. सीधे खड़े होकर शरीर का संतुलन बनाएं। 2. एक पैर को मोड़कर दूसरे पैर की जांघ पर रखें। 3. धीरे-धीरे दोनों घुटनों को मोड़ते हुए नीचे आएं। 4. हाथों को नमस्कार मुद्रा में छाती के सामने जोड़ें। 5. रीढ़ को सीधा रखें और सामने देखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस खड़े होकर दूसरी ओर दोहराएं।
वातायनासन पैरों और घुटनों की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन और स्थिरता बढ़ाता है। कूल्हों में लचीलापन लाता है। एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता है। रीढ़ सीधी रहती है। शरीर का समन्वय बेहतर होता है। मानसिक धैर्य बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक संतुलित और मजबूत बनता है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। संतुलन न बनने पर दीवार का सहारा लें। घुटनों की चोट होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर संतुलन और पैरों की मजबूती में सुधार दिखाई देता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों के बीच कंधों जितनी दूरी रखें। 2. दोनों हाथों को कंधों की ऊंचाई तक सामने उठाएं। 3. सांस छोड़ते हुए शरीर को दाईं ओर मोड़ें। 4. बायां हाथ दाएं कंधे पर और दायां हाथ पीठ के पीछे रखें। 5. गर्दन को भी दाईं ओर घुमाएं। 6. सामान्य सांस लेते हुए कुछ सेकंड रुकें। 7. वापस बीच में आएं और दूसरी ओर दोहराएं। 8. दोनों तरफ 8 से 10 बार अभ्यास करें।
कटि चक्रासन कमर और रीढ़ की जकड़न कम करता है। रीढ़ को लचीला बनाता है। कमर दर्द में राहत दिलाने में सहायक है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। रक्त संचार बढ़ता है। लंबे समय तक बैठने वालों के लिए यह लाभदायक है। नियमित अभ्यास से शरीर हल्का और फुर्तीला महसूस होता है।
सुबह खाली पेट या हल्के वार्म-अप के बाद करें। 8 से 10 राउंड पर्याप्त हैं। शरीर को झटके से न मोड़ें।
लगातार 2 सप्ताह अभ्यास करने पर कमर की जकड़न कम होने लगती है और शरीर अधिक लचीला महसूस होता है।
1. वज्रासन में बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों का सहारा लेकर धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकें। 3. पीठ और सिर को आराम से जमीन पर रखें। 4. दोनों हाथों को सिर के ऊपर या जांघों पर रखें। 5. छाती को हल्का ऊपर उठाकर रखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. हाथों का सहारा लेकर धीरे-धीरे वापस बैठ जाएं।
पर्यंकासन जांघों और घुटनों में लचीलापन बढ़ाता है। रीढ़ और कमर को आराम देता है। छाती खुलती है जिससे श्वास बेहतर होती है। पाचन तंत्र को लाभ मिलता है। शरीर का तनाव कम होता है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर अधिक आरामदायक महसूस करता है। नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। 20 से 30 सेकंड तक रुकें। घुटनों या कमर में गंभीर दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 3 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन और आराम महसूस होने लगता है।
1. शवासन की मुद्रा में पीठ के बल आराम से लेट जाएं। 2. दोनों हाथ और पैर थोड़ी दूरी पर रखें। 3. आंखें बंद करें और पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। 4. अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करें। 5. धीरे-धीरे शरीर के प्रत्येक अंग को मानसिक रूप से शिथिल करें। 6. मन को शांत रखें और विचारों को आने-जाने दें। 7. 10 से 20 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. अंत में धीरे-धीरे आंखें खोलकर सामान्य स्थिति में आएं।
योग निद्रा मानसिक तनाव, चिंता और थकान कम करने की प्रभावी प्रक्रिया है। शरीर और मन को गहरा आराम मिलता है। नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है। एकाग्रता और याददाश्त बढ़ती है। रक्तचाप को संतुलित रखने में सहायता मिलती है। मानसिक शांति बढ़ती है। शरीर में नई ऊर्जा आती है। नियमित अभ्यास से संपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।
सुबह योगाभ्यास के बाद या रात को सोने से पहले करें। 10 से 20 मिनट तक शांत वातावरण में अभ्यास करें।
पहले ही सप्ताह से तनाव और थकान में कमी महसूस होने लगती है। नियमित अभ्यास से मानसिक शांति और नींद की गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार होता है।
1. सीधे खड़े होकर दोनों पैरों को मिलाएं। 2. शरीर का भार दोनों पैरों पर समान रखें। 3. दोनों हथेलियों को छाती के सामने नमस्कार मुद्रा में जोड़ें। 4. कंधों को ढीला रखें और रीढ़ सीधी रखें। 5. आंखें बंद करके सामान्य गति से सांस लें। 6. मन को शांत रखते हुए श्वास पर ध्यान केंद्रित करें। 7. 30 सेकंड से 1 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे हाथ नीचे लाकर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
प्रणामासन शरीर और मन को स्थिर करने वाला सरल योगासन है। एकाग्रता बढ़ाता है। मानसिक शांति प्रदान करता है। शरीर का संतुलन बेहतर बनाता है। ध्यान के लिए मन को तैयार करता है। तनाव कम करने में मदद करता है। सही मुद्रा बनाए रखने में सहायता करता है। नियमित अभ्यास से आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता बढ़ती है।
सुबह योगाभ्यास शुरू करने से पहले या ध्यान से पहले करें। 1 से 2 मिनट तक अभ्यास करना लाभदायक है।
कुछ दिनों के नियमित अभ्यास से मन शांत और एकाग्र महसूस होने लगता है तथा ध्यान लगाने में आसानी होती है।
1. योगा मैट पर घुटनों के बल बैठ जाएं। 2. दोनों पैरों को पीछे की ओर रखें और आराम से बैठें। 3. रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखें। 4. दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखें। 5. आंखें बंद करें और सामान्य गति से गहरी सांस लें। 6. शरीर को पूरी तरह स्थिर रखें। 7. 2 से 5 मिनट तक इस मुद्रा में बैठे रहें। 8. धीरे-धीरे आंखें खोलें और सामान्य स्थिति में लौट आएं।
ब्रह्मचर्यासन मानसिक शांति और आत्मनियंत्रण बढ़ाने में सहायक माना जाता है। रीढ़ सीधी रहती है। ध्यान और प्राणायाम के लिए यह उपयोगी मुद्रा है। एकाग्रता बढ़ती है। तनाव और बेचैनी कम होती है। शरीर स्थिर रहता है। लंबे समय तक बैठने की क्षमता बढ़ती है। नियमित अभ्यास से मानसिक संतुलन बेहतर होता है।
सुबह शांत वातावरण में खाली पेट करें। ध्यान या प्राणायाम से पहले 2 से 5 मिनट तक अभ्यास करें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर मानसिक स्थिरता और एकाग्रता में सुधार महसूस होने लगता है।
1. जमीन पर बैठकर एक पैर की एड़ी को जननांगों के पास रखें। 2. दूसरे पैर को पहले पैर के ऊपर इस प्रकार रखें कि दोनों पैर आरामदायक स्थिति में रहें। 3. रीढ़ को सीधा रखें। 4. दोनों हाथों को घुटनों पर ज्ञान मुद्रा में रखें। 5. आंखें बंद करें और सामान्य गति से सांस लें। 6. मन को श्वास पर केंद्रित रखें। 7. 5 से 10 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को खोलकर सामान्य स्थिति में लौट आएं।
सिद्धासन ध्यान और प्राणायाम के लिए श्रेष्ठ बैठने की मुद्राओं में से एक है। रीढ़ सीधी रहती है। मानसिक शांति बढ़ती है। एकाग्रता और ध्यान लगाने की क्षमता विकसित होती है। शरीर स्थिर रहता है। तनाव कम होता है। लंबे समय तक बैठने में सुविधा होती है। नियमित अभ्यास से मन अधिक शांत और संतुलित रहता है।
सुबह खाली पेट ध्यान या प्राणायाम से पहले करें। शुरुआत में 5 मिनट तक बैठें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर ध्यान लगाने में आसानी और मानसिक शांति महसूस होने लगती है।
1. योगा मैट पर आराम से बैठ जाएं। 2. दोनों पैरों को मोड़कर क्रॉस करें। 3. प्रत्येक पैर को विपरीत घुटने और पिंडली के बीच आराम से रखें। 4. रीढ़ को सीधा रखें और कंधों को ढीला छोड़ दें। 5. दोनों हाथों को घुटनों पर रखें। 6. आंखें बंद करें और सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 5 से 10 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे पैरों को खोलकर विश्राम करें।
स्वस्तिकासन मन को शांत रखने में सहायक है। ध्यान और प्राणायाम के लिए उपयुक्त बैठने की मुद्रा है। रीढ़ की सही स्थिति बनाए रखता है। मानसिक तनाव कम करता है। एकाग्रता बढ़ाता है। शरीर स्थिर रहता है। लंबे समय तक बैठने की आदत विकसित होती है। नियमित अभ्यास से मानसिक संतुलन बेहतर होता है।
सुबह या शाम शांत वातावरण में करें। ध्यान से पहले 5 से 10 मिनट तक अभ्यास करें।
लगातार कुछ सप्ताह अभ्यास करने पर ध्यान और मानसिक शांति में सुधार महसूस होने लगता है।
1. दोनों पैरों को सामने सीधा फैलाकर बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों को कूल्हों के पास जमीन पर रखें। 3. रीढ़ को सीधा रखें और पैरों को पूरी तरह सीधा रखें। 4. पंजों को अपनी ओर खींचें। 5. छाती को ऊपर उठाकर सामने देखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे शरीर को ढीला छोड़कर विश्राम करें।
दण्डासन बैठने की सही मुद्रा विकसित करता है। रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है। पैरों और घुटनों की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। शरीर का संतुलन बढ़ता है। हैमस्ट्रिंग में हल्का खिंचाव आता है। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर सीधा रखने की आदत बनती है। नियमित अभ्यास से पोश्चर बेहतर होता है।
सुबह योगाभ्यास की शुरुआत में करें। 30 सेकंड से 1 मिनट तक अभ्यास पर्याप्त है।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर बैठने की मुद्रा और रीढ़ की स्थिरता में सुधार महसूस होने लगता है।
1. दोनों पैरों को सामने फैलाकर बैठ जाएं। 2. दाएं घुटने को मोड़कर पैर को शरीर के पास रखें। 3. बाएं पैर को सीधा रखें। 4. बाएं हाथ को दाएं घुटने के बाहर ले जाकर शरीर को दाईं ओर मोड़ें। 5. दाएं हाथ को पीछे जमीन पर रखें। 6. रीढ़ को सीधा रखें और सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. वापस आकर दूसरी ओर यही प्रक्रिया दोहराएं।
मारीच्यासन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है। पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। कमर और पीठ की जकड़न कम करता है। पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। रक्त संचार बढ़ता है। तनाव कम होता है। नियमित अभ्यास से रीढ़ स्वस्थ और लचीली रहती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। कमर में गंभीर दर्द होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।
लगातार 2 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर रीढ़ की लचक और पाचन क्षमता में सुधार महसूस होने लगता है।
1. पहले पद्मासन लगाकर आराम से बैठ जाएं। 2. दोनों हाथों को जांघ और पिंडली के बीच से निकालें। 3. हथेलियों को मजबूती से जमीन पर रखें। 4. गहरी सांस लेकर शरीर का भार हाथों पर डालें। 5. धीरे-धीरे पूरे शरीर को जमीन से ऊपर उठाएं। 6. रीढ़ सीधी रखें और संतुलन बनाए रखें। 7. सामान्य गति से सांस लेते हुए 10 से 20 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे वापस जमीन पर आकर विश्राम करें।
कुक्कुटासन हाथों, कंधों और कलाइयों को मजबूत बनाता है। पेट और कोर मसल्स की ताकत बढ़ाता है। शरीर का संतुलन और नियंत्रण बेहतर करता है। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर में आत्मविश्वास विकसित होता है। रक्त संचार बेहतर होता है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। नियमित अभ्यास से ऊपरी शरीर मजबूत होता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआत में योग प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें। कलाई या कंधे की चोट होने पर अभ्यास न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर हाथों की ताकत और संतुलन में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. दोनों पैरों को चौड़ा फैलाकर खड़े हो जाएं। 2. दाएं घुटने को मोड़ते हुए शरीर का भार दाईं ओर ले जाएं। 3. बाएं पैर को पूरी तरह सीधा रखें। 4. दोनों हथेलियों को नमस्कार मुद्रा में जोड़ें। 5. रीढ़ को सीधा रखें और सामने देखें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक रुकें। 8. दूसरी ओर भी यही प्रक्रिया दोहराएं।
स्कंदासन कूल्हों, जांघों और घुटनों को मजबूत बनाता है। पैरों में लचीलापन बढ़ाता है। शरीर का संतुलन बेहतर करता है। कमर की जकड़न कम होती है। रक्त संचार बढ़ता है। शरीर अधिक फुर्तीला बनता है। खेल गतिविधियों के लिए उपयोगी है। नियमित अभ्यास से पैरों की ताकत बढ़ती है।
सुबह खाली पेट करें। दोनों तरफ 2 से 3 बार अभ्यास करें। घुटनों में दर्द होने पर सावधानी रखें।
लगातार 2 से 3 सप्ताह अभ्यास करने पर पैरों और कूल्हों में लचीलापन महसूस होने लगता है।
1. पैरों को थोड़ा फैलाकर खड़े हों और घुटनों को मोड़ें। 2. दोनों कंधों को जांघों के अंदर ले जाएं। 3. हथेलियों को जमीन पर मजबूती से रखें। 4. धीरे-धीरे शरीर का भार हाथों पर लाएं। 5. दोनों पैरों को सामने सीधा उठाएं। 6. संतुलन बनाए रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 10 से 20 सेकंड तक रुकें। 8. धीरे-धीरे वापस जमीन पर आ जाएं।
तित्तिभासन हाथों, कंधों और पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। एकाग्रता विकसित करता है। कोर मसल्स मजबूत होती हैं। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। सहनशक्ति बढ़ती है। आत्मविश्वास बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक शक्तिशाली महसूस करता है।
सुबह खाली पेट करें। शुरुआती लोग प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें। कलाई में चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 1 से 2 महीने अभ्यास करने पर संतुलन और हाथों की मजबूती में स्पष्ट सुधार दिखाई देता है।
1. जमीन पर बैठकर एक पैर को कंधे के ऊपर रखें। 2. दोनों हथेलियों को जमीन पर मजबूती से टिकाएं। 3. दूसरे पैर को पहले पैर पर क्रॉस करें। 4. शरीर का भार हाथों पर लाएं। 5. दोनों पैरों को एक साथ उठाकर सीधा करें। 6. संतुलन बनाए रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 10 से 20 सेकंड तक रुकें। 8. धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं।
अष्टावक्रासन हाथों, कंधों और पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। रीढ़ की लचक बनाए रखता है। एकाग्रता और आत्मविश्वास बढ़ाता है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। सहनशक्ति बढ़ती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक मजबूत और संतुलित बनता है।
सुबह खाली पेट करें। केवल अनुभवी साधक या प्रशिक्षक की देखरेख में अभ्यास करें।
लगातार 1 से 2 महीने अभ्यास करने पर शरीर की ताकत और संतुलन में उल्लेखनीय सुधार दिखाई देता है।
1. लंज की स्थिति से शुरुआत करें। 2. दोनों हथेलियों को जमीन पर रखें। 3. आगे वाले पैर को कंधे पर टिकाएं। 4. शरीर का भार हाथों पर लाते हुए दोनों पैरों को उठाएं। 5. एक पैर आगे और दूसरा पीछे सीधा रखें। 6. संतुलन बनाए रखें और सामान्य सांस लेते रहें। 7. 10 से 20 सेकंड तक रुकें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में आएं।
यह आसन हाथों, कंधों और पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है। शरीर का संतुलन बढ़ाता है। कोर मसल्स सक्रिय होती हैं। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है। सहनशक्ति विकसित होती है। शरीर अधिक लचीला बनता है। नियमित अभ्यास से आत्मविश्वास बढ़ता है।
सुबह खाली पेट करें। केवल अनुभवी साधकों के लिए उपयुक्त है। प्रशिक्षक की देखरेख में ही अभ्यास करें।
लगातार 1 से 2 महीने अभ्यास करने पर संतुलन, ताकत और शरीर के नियंत्रण में स्पष्ट सुधार होता है।
1. खड़े होकर साइड लंज की स्थिति बनाएं। 2. एक हाथ को जमीन पर रखें। 3. सामने वाले पैर को कंधे के ऊपर टिकाएं। 4. दूसरे हाथ को ऊपर की ओर फैलाएं। 5. शरीर का भार एक हाथ पर संतुलित करें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 10 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में लौट आएं।
विश्वामित्रासन पूरे शरीर की ताकत और संतुलन बढ़ाता है। हाथों, कंधों और पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। कूल्हों में लचीलापन बढ़ता है। रीढ़ मजबूत होती है। शरीर का समन्वय बेहतर होता है। आत्मविश्वास बढ़ता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक शक्तिशाली और लचीला बनता है।
सुबह खाली पेट करें। उन्नत स्तर का आसन है। योग प्रशिक्षक की देखरेख में ही अभ्यास करें।
लगातार 1 से 2 महीने अभ्यास करने पर शरीर की ताकत और संतुलन में उल्लेखनीय सुधार दिखाई देता है।
1. पद्मासन लगाकर बैठ जाएं। 2. धीरे-धीरे शरीर को पीछे की ओर लेटाएं। 3. दोनों हाथों को सिर के पीछे ले जाएं। 4. शरीर को आरामदायक स्थिति में रखें। 5. गर्दन और पीठ पर अधिक दबाव न डालें। 6. सामान्य गति से सांस लेते रहें। 7. 20 से 30 सेकंड तक रहें। 8. धीरे-धीरे वापस बैठ जाएं।
उत्तान कूर्मासन रीढ़ और कूल्हों को लचीला बनाता है। छाती खुलती है। मानसिक तनाव कम होता है। शरीर को गहरा आराम मिलता है। ध्यान और एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है। रक्त संचार सुधरता है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक लचीला महसूस होता है।
सुबह खाली पेट करें। पद्मासन में अच्छी पकड़ होने के बाद ही इसका अभ्यास करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर में लचीलापन और मानसिक शांति महसूस होने लगती है।
1. पद्मासन लगाकर पीठ के बल लेट जाएं। 2. दोनों घुटनों को छाती की ओर लाएं। 3. दोनों हाथों को पैरों के बीच से निकालकर घुटनों को पकड़ें। 4. शरीर को गोल आकार में रखें। 5. संतुलन बनाए रखें और सामान्य सांस लें। 6. गर्दन को आरामदायक स्थिति में रखें। 7. 15 से 20 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें। 8. धीरे-धीरे वापस सामान्य स्थिति में लौट आएं।
पिंडासन रीढ़ की लचक बढ़ाता है। पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करता है। शरीर का संतुलन बेहतर बनाता है। मानसिक शांति बढ़ती है। कूल्हों और घुटनों में लचीलापन आता है। शरीर को आराम मिलता है। ध्यान लगाने में सहायता मिलती है। नियमित अभ्यास से शरीर अधिक संतुलित महसूस होता है।
सुबह खाली पेट करें। पद्मासन में सहज होने के बाद ही इसका अभ्यास करें। घुटनों में चोट होने पर यह आसन न करें।
लगातार 3 से 4 सप्ताह अभ्यास करने पर शरीर का संतुलन और लचीलापन बेहतर महसूस होने लगता है।
1. वज्रासन में बैठें। 2. घुटनों के बल खड़े हों। 3. धीरे-धीरे पीछे झुकें। 4. सिर को पीछे ले जाकर जमीन के पास लाएं। 5. जांघों को सीधा रखें। 6. सामान्य श्वास लें।
रीढ़ की लचक बढ़ती है। जांघें मजबूत होती हैं। छाती खुलती है। पाचन में सहायता मिलती है। शरीर की मुद्रा सुधरती है।
सुबह खाली पेट करें। केवल अनुभवी साधक करें।
लगातार अभ्यास से 1 से 2 महीने में रीढ़ अधिक लचीली महसूस होती है।
1. बैठकर एक पैर को कंधे के पीछे रखें। 2. दूसरा पैर सामने रखें। 3. रीढ़ सीधी रखें। 4. दोनों हाथ नमस्कार मुद्रा में रखें। 5. सामान्य श्वास लेते रहें।
कूल्हों में लचीलापन बढ़ता है। रीढ़ मजबूत होती है। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का संतुलन बेहतर होता है।
उन्नत साधकों के लिए उपयुक्त। खाली पेट करें।
नियमित अभ्यास से 1 महीने में लचीलापन बढ़ने लगता है।
1. एक पैर को दूसरे की जांघ पर रखें। 2. आगे झुककर दोनों हथेलियां जमीन पर रखें। 3. शरीर का भार हाथों पर लें। 4. पीछे वाला पैर ऊपर उठाएं। 5. संतुलन बनाए रखें।
हाथ मजबूत होते हैं। संतुलन बढ़ता है। कोर मसल्स मजबूत होती हैं। कूल्हों में लचीलापन आता है।
सुबह खाली पेट प्रशिक्षक की देखरेख में करें।
लगातार अभ्यास से संतुलन और ताकत बढ़ती है।
1. साइड प्लैंक से शुरुआत करें। 2. ऊपर वाले पैर को मोड़कर पकड़ें। 3. शरीर का संतुलन बनाए रखें। 4. सामान्य श्वास लें।
हाथ, कंधे और रीढ़ मजबूत होते हैं। संतुलन बढ़ता है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है।
केवल अनुभवी साधक करें।
लगातार अभ्यास से शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है।
1. पद्मासन लगाएं। 2. हथेलियां जमीन पर रखें। 3. कोहनियां पेट पर टिकाएं। 4. शरीर को ऊपर उठाएं।
हाथ मजबूत होते हैं। पाचन बेहतर होता है। संतुलन बढ़ता है। कोर मजबूत होती है।
खाली पेट करें। उन्नत स्तर का आसन है।
1 से 2 महीने में ताकत और संतुलन बेहतर होता है।
1. पिंचा मयूरासन से शुरुआत करें। 2. दोनों पैरों को सिर के पीछे ले जाएं। 3. संतुलन बनाए रखें।
रीढ़ अत्यधिक लचीली होती है। हाथ और कंधे मजबूत होते हैं। शरीर का संतुलन बढ़ता है।
केवल विशेषज्ञ की देखरेख में करें।
लंबे अभ्यास से शरीर अत्यधिक लचीला बनता है।
1. बैठकर दोनों पैरों को मोड़ें। 2. शरीर को पूरी तरह मोड़ें। 3. रीढ़ सीधी रखें। 4. सामान्य श्वास लें।
रीढ़ मजबूत होती है। पाचन बेहतर होता है। कमर की जकड़न कम होती है।
सुबह खाली पेट करें।
2 से 4 सप्ताह में रीढ़ अधिक लचीली महसूस होती है।
1. दोनों कोहनियां जमीन पर रखें। 2. पैरों को ऊपर उठाएं। 3. शरीर को सीधा रखें। 4. संतुलन बनाए रखें।
कंधे और हाथ मजबूत होते हैं। संतुलन बढ़ता है। रक्त संचार बेहतर होता है।
दीवार के सहारे शुरुआत करें।
लगातार अभ्यास से हाथों की ताकत बढ़ती है।
1. चक्रासन की स्थिति बनाएं। 2. कोहनियों को जमीन पर रखें। 3. शरीर को स्थिर रखें। 4. सामान्य श्वास लें।
रीढ़ अत्यधिक लचीली बनती है। छाती खुलती है। कंधे मजबूत होते हैं।
उन्नत साधकों के लिए उपयुक्त।
1 से 2 महीने में शरीर की लचक बढ़ती है।
1. दोनों हथेलियों और सिर को जमीन पर रखें। 2. पैरों को ऊपर उठाएं। 3. शरीर को सीधा रखें। 4. सामान्य श्वास लेते रहें।
संतुलन बढ़ता है। कंधे मजबूत होते हैं। एकाग्रता बढ़ती है। शरीर का नियंत्रण बेहतर होता है।
प्रशिक्षक की देखरेख में करें। गर्दन की समस्या होने पर न करें।
नियमित अभ्यास से संतुलन और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।